तीरगी के फ़रेब खाता हूँ
रौशनी को भी आज़माता हूँ

रोज़ चुपके से टूटने पर भी
ख़्वाब कितने मगर सजाता हूँ

आग में याद कब जला करती
आग हर बार पर लगाता हूँ

इसको किस्मत ही मानकर अपनी
हर घड़ी आपसे निभाता हूँ

दिल की डोली सजी है आ जाओ
रोज़ आवाज़ मैं लगाता हूँ

वक़्त की कामयाब साज़िश है
उसके आगे मैं सर झुकाता हूँ

जो न ‘आनन्द’ कह सका अब तक
राज़ उनको वही बताता हूँ

स्वरचित
डॉ आनन्द किशोर
दिल्ली

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