तुम याद आती हो

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तुम याद आती हो

By |2018-02-15T08:39:56+00:00February 15th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

तुम याद आती हो

तो यह नहीं कि
आते ही चली जाती हो
किसी ख़्वाब की मानिंद

तुम याद आती हो
तो ऐसे, जैसे कि
वर्षों पुराने झगड़े अभी भी
हम लड़ते हुए से लगते हैं
और तुम सुलझाती हुईं

तुम याद आती हो
हम लोगों को भरपेट खाना खिलाकर
तुम जब खाने की बची-खुची जूठन
चुपके से खा लिया करती थीं
बिना कुछ कहे मुस्कुराते हुए

तुम याद आती हो
जब खुद ठंड सहकर भी
मुझे अपने सीने से लगाए रहती थीं

तुम याद आती हो
जब स्कूल से घर लौटने तक
मेरा बेसब्री से इंतज़ार करती थीं

तुम याद आती हो
ठंड के मौसम में
भुने चने और मूंगफलियों
की पोटली
और भी बहुत कुछ रखते हुए

तुम याद आती हो
वारिश में खुलेआम नहाने से
मना करने के बावजूद जाने पर
स्नेह भरी तुम्हारी डांट

तुम याद आती हो
जब मैं ये सब कुछ
अब जब कभी करता हूँ
तो कोई नहीं टोकता
न भूख लगती है
अब न स्कूल जाना होता है
चने, मूंगफलियों की फसलें
अब बहुत कम आने लगी हैं
बारिश तो घंटे भर भी नहीं ठहरती ।

दिनेश कुमार

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About the Author:

दिनेश कुमार शोधार्थी (हिन्दी) साँची विश्वविद्यालय, मध्यप्रदेश

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