ऑफिस ऑफिस

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By |2018-02-15T14:35:26+00:00February 15th, 2018|Categories: व्यंग्य|Tags: , , |2 Comments

एक फोकटिया लेखक और मास्टर ये लोग बहुत ही ख़तरनाक होते हैं क्यूंकि दोनों अगर किसी पे अगर पिनक जाएँ तो एक अदना सी दिखती कलम से बहुतों का जीना मुहाल कर सकते हैं! मास्टरी धन्धे में तो हमें सालों हो गए थे परन्तु हमारे लेख पढ़कर कई लोगों का कहना है कि अब हम दिन-ब-दिन फोकटिया लेखक में तब्दील होते जा रहे हैं! ख़ैर ऐसे ही एक दिन हम चिर-परिचित निद्रासन का कक्षा में अभ्यास कर रहे थे कि हमें बंद आँखों में ही अपने समक्ष देवर्षि नारद दिखाई दिए! नारद उवाचः, “वत्स! एक ईमानदार पर्यवेक्षक की स्वर्ग को आवश्यकता है और हमारे यहाँ के ‘प्रशासनिक-सचिव’ चित्रगुप्त ने सारे कर्म-कुकर्म की ‘फ़ाइल’ देखने के बाद मुझे आपका नाम ‘रेकमेण्ड’ किया है! तुम्हारे जीव को लेकर मैं अभी स्वर्ग-प्रयाण करूँगा और मध्य-मार्ग में ही तुम्हारे जीव-पटल पर वहां के पर्यवीक्षितार्थ घटना का घटनाक्रम स्वतः ही ‘अपलोड’ हो जाएगा और कार्य पूर्ण होने के पश्चात ऐसे गायब हो जाएगा जैसे रातों-रात भारत से ‘सूरा-सम्राट’ गायब हो गए थे!” मैं डर गया कि ‘सूरा-सम्राट’ की चर्चा स्वर्ग तक पहुँच चुकी है, मैंने देवर्षि से पूछा, “हे देवर्षि! क्या ‘सुराधिपति’ भारतीय पुलिस की हाल ही की धर-पकड़ से घबराकर,आंग्ल-देश से प्रस्थान कर स्वर्गस्थ हो गए हैं?” देवर्षि बोले,”पुत्र! जिस दिन स्वर्ग में कालाधन का अस्तित्व आ जायेगा और उसे अगर कहीं पार लगवाना होगा तब ही उन्हें स्वर्गस्थ किया जाएगा!” जैसे ही मैंने प्रयाण करना शुरू किया, मेरे जीव-पटल पर घटना से सम्बंधित सारे दृश्य उभरने लग गए:
श्री हरि का कार्यालय बड़ा ही शांत था कि तभी उनके ‘केबिन’ में उनका ‘पी. ऐ.’ गुस्से से लाल मुद्रा में धड़धड़ाते हुए घुसा और बोलने लगा,”प्रभु! या तो मुझे पदच्युत किया जाए या कार्यालय स्थानांतरण किया जाए!” श्री हरि इस अनपेक्षित आक्रमण से थोड़ा विस्मित हो गए और घबराकर पूछने लगे, “हुआ क्या है जो आप इतना उत्तेजित हो रखे हैं?” पी. ऐ. उवाचः, “प्रभु! ब्रह्मा जी के ऑफिस से सारी फ़ाइलें तो मुझे ही चिन्हित करके भेजी जातीं हैं, चित्रगुप्त को तो कोई काम है ही
नहीं! फिर हमें कमाने का मौका तब मिलता था जब आप अवतार लेते थे क्यूंकि उससे समबन्धित ‘कॉस्ट्यूम’ और ‘प्रेज़न्टेशन’ जैसे कि आपका खम्बा तोड़कर निकलने के सारे टेंडर हमारे कमाने के स्त्रोत थे जिसे आपने ही ये कहकर कि संभवामि युगे: युगे: कहकर उस प्रोसेस पर ऑब्जेक्शन लगवा दिया! अब बताइये क्या करें यहाँ रहकर!” श्री हरि पहली बार किंकर्त्तव्यविमूढ़ दिख रहे थे और उन्होनें ब्रह्मा जी के पास अपने पी. ऐ. को लेकर गए और उसे बाहर रुकने का निर्देश देकर स्वयं भीतर चले गए! काफी देर तक अंदर तेज़ आवाज़ों में बहसबाज़ी और टेबल कूटने की आवाज़ों के पश्चात विष्णु जी बाहर आये और अपने पी. ऐ. को कहा, “आपको ब्रह्मदेव के ऑफिस में चित्रगुप्त का स्थान एक वर्ष हेतू दिया जा रहा है और चित्रगुप्त को एक साल के अवकाश पे भेजा जा रहा है! आपके कार्य-उत्पादकता को एक वर्ष निगरानी में रखा जाएगा तत्पश्चात आपको उचित पुरस्कार दिया जाएगा!” ईनाम का लालच अच्छे-अच्छे कर्मचारी की उत्पादकता बढ़ा देता है और यहाँ भी यही हुआ! एक वर्ष पलक झपकते बीत गया और पी. ऐ. के हाथ में एक सीलबंद लिफ़ाफा था! पी. ऐ. ने जैसे ही लिफ़ाफा खोला वो झल्लाकर रह गया क्यूंकि उसमें लिखा था कि उचित वेतनवृद्धि के साथ आपको पुनः श्री हरि के कार्यालय में पदस्थापित किया जाता है! पी. ऐ. की समझ में आ गया की ये सब विष्णु-लीला है!”
जैसे ही ये घटनाक्रम ख़त्म हुआ कि अचानक देवर्षि आये और मुझे धक्का देते हुए कहने लगे, “कार्यालय-आदेश बदल गया और क्यूंकि अब तुम पद पे नहीं हो तो तुम्हें यहाँ से जाना ही होगा!” उनके इतना कहते ही अचानक मैं आकाश से गिरने लगा और तदुपरांत मेरी नींद टूट गयी! मैं बिस्तर पे बैठा-बैठा सोच रहा था कि अगर ऊपर ऐसे हालात हैं तभी कोई जीव ऊपर जाता है तो वापिस नहीं आ पाता है क्यूंकि वो भी कहीं फ़ाइल बनकर घूमता रहता है! “स्वर्ग और नर्क धरा पर ही हैं!” किसी महान व्यक्ति ने ये बात किसी कार्यालय में अपनी फ़ाइल स्थिति देखकर ही कही होगी! मैं परेशान और हैरान होकर बस इंतज़ार में हूँ कि कब कार्यलत-आदेश के साथ मुझे वहां पुनः बुलाया जाए और मैं अपना ‘टी-ऐ, डी-ऐ’ ‘क्लेम’ करूँ!

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ek shikshak jisey likhne ka shauk hai

2 Comments

  1. saurabh kumar February 15, 2018 at 9:59 pm

    मज़ा आ गया!

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  2. Himanshu Sharma February 16, 2018 at 9:13 am

    Shukriya Saurabh ji

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