मुझसे मेरी मुलाकात

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मुझसे मेरी मुलाकात

By |2018-02-15T19:27:47+00:00February 15th, 2018|Categories: व्यंग्य|Tags: , , |0 Comments
कभी मुझे भी पत्रकारिता का शौक़ लगा था और मैं सोचा करता था कि मेरा भी कोई लेख पत्र-पत्रिका में छपेगा, परन्तु शौक़ वक़्त के पन्नों में दबकर रह गया! आज बैठा-बैठा सोच रहा था कि मुझे याद आ या एक शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारी का एक साक्षात्कार जो कि मैनें ही कहीं नहीं दिया, क्यूंकि विवाद होने का खतरा था!
किसीके कहने पर मैं एक शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारी के पास पहुंचा ये सोचकर की आजकल जो भी शिक्षा से सम्बंधित समस्याएं हैं उन पर परिचर्चा करूँगा! जैसे ही मैं उनके घर पहुंचा तो पता चला की साहब पूजा कर रहे हैं, अगर अंदर भी जाओ तो कुछ मत कहना क्यूंकि साहब को पूजा भंग होने पर बहुत गुस्सा आता है! ये सलाह पाकर अंदर पहुंचा तो देखा साहब वास्तव में पूजामग्न हैं और सामने जिसका चित्र था वो उनका खुद का ही था! मुझे लगा फ़क़ीर मंसूर के चर्चित वक्तव्य “अंहलक” (मैं ही ईश्वर हूँ!) को बड़ी गम्भीरता से ले लिया था! ऐसे लोग बिरले ही मिलते हैं जो खुद को ईश्वर के समतुल्य समझते हैं, ऐसे लोग खुद ही मंदिर के पुजारी बनते हैं और खुद ही भगवान् की जगह बैठकर खुद की ही पूजा करके खुद ही प्रसाद बांटकर खुद के जयकारे लगते हैं और बाहर आकर बताते हैं कि भगवान् ने मुझे दर्शन दिए! खैर पैंतालीस मिनटों के ध्यान-पूजन के बाद साहब मेरे समीप आये! मैनें उन्हें अपने आने का प्रयोजन बताया जिसपर उनके होंठ इस तरह से मुस्कराहट के पोज़ में खड़े हो गए जैसे डी. एस. पी. साहब के आने पर समूचा विभाग खड़ा हो जाता क्यूंकि उसे ऐसा करने का आदेश मिला होता है! उनका शारीरिक बनावट की क्या बात करूँ, वृद्धावस्था आने के बाद भी शरीर ऐसे तना हुआ जैसे पेड़ कटने के बाद ठूँठ बचता है! आँख, नाक, कान और सभी शारीरिक अंग भी ऐसे आकड़े हुए थे जैसे कि पूरा शरीर खाल से नहीं मांड की पपड़ी से बना हो, अकड़ा हुआ!
ख़ैर साक्षात्कार शुरू हुआ और मैंने अपने प्रश्नों का पोटला खोला!
मैनें पूछा, “सर! आप इस व्यवस्था को सँभालने में अपने आपको कितना योग्य मानते हैं?”
उन्होंने बीच में ही टोका, “आपका सवाल ही गलत है जी! ये व्यवस्था मुझसे ही तो है, मैं हो व्यवस्था का केंद्र हूँ और जितनी भी उन्नति हुई है वो मेरे ही कारण हुई है! आप जानते हैं, मेरे ही कहने पर ये मेरे सारे “सबऑर्डिनेट” यहाँ पर तबादला किये गए हैं!” मुझे लगा अगर आज उनसे मैं ओसामा के हत्या के बारे में भी सवाल पूछता तो वो शायद कह ही देते कि ओबामा को बताया था की ओसामा कहाँ है या गौ-रक्षा के सवाल पर ये बयां दे देते कि मानव-जाति में वो पहले आदमी हैं जिनमे बछड़ा पैदा कर गौ-रक्षा करने की क्षमता है!
मैनें आगे पूछा, “सर! उन्नति अपने सिर ले ली पर छात्रों के सड़ा हुआ अनाज खाकर बीमार पड़ने के बारे में आप क्या चाहते हैं?”
उन्होंने उसी चढ़े हुए नाक और आँखों को नचाकर कहा, “अनाज सड़ा नहीं था, मेरे राज में अनाज सड़ ही नहीं सकता, अजी गंदे-संदे हाथों से खा लिया होगा इसलिए बीमार पड़े थे, इसमें अनाज का कोई कुसूर नहीं था!” इनके इस जवाब के बाद मुझे उनमें धृतराष्ट्र का चेहरा नज़र आने लगा था, हालाँकि धृतराष्ट्र पुत्र-मोह में अंधे थे पर ये स्व-मोह में इतने अंधे हो चुके थे कि इन्हें अपने हाथ पर लगी गन्दगी दिखनी बंद हो गयी थी!
मैनें उनसे पूछा, “कालेजों में शोध के नाम पर फंड तो जाता है पर शोध नहीं होती है, क्यों?”
साहब ने कहा, “देखिये! शोध का अंग्रेजी में रूपांतरण करने पर शब्द आता है रिसर्च और रिसर्च का मतलब होता है पुनः खोजना, तो जो चीज़ पुनः खोजी जाए उस पर फंड क्यों व्यय करना, इसका उपयोग मैं अपने एडमिनिस्ट्रेशन को मज़बूत बनाने में करूँगा!” मुझे लगा शोध से इन्हें उतना ही प्रेम है जैसे एक “युवराज” को अक्ल से!
मैंने उनसे पूछा की आपकी नज़र में शिक्षक ऊपर है या प्रशासन?
उनका उत्तर चकित कर देनेवाला था, “प्रशासन! क्यूंकि अगर ये तनख़्वाह न दें तो मेरा जिन मुहाल हो जाएगा और हाँ मेरे प्रशासनिक अधिकारीयों पर मैं और कोई प्रश्न नहीं लूँगा, क्यूंकि उन्हें मैंने नौकरी पर रखा है!”
मैनें उनसे विदा ली और पीछे पलटकर देखा तो साहब खाना खाने में मग्न थे, पर मेरी नज़र उनकी थाली में पूरी की पूरी शिक्षा व्यवस्था परोसी हुई थी और उनका मुंह की जगह मुझे एक बकरे का मुंह नज़र आने लगा था जो धीरे-धीरे पूरी शिक्षा को खाये जा रहा और हर ग्रास के बाद सिर्फ “मैं-मैं” ही बोल पा रहा था!
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ek shikshak jisey likhne ka shauk hai

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