एक मुक्तक

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एक मुक्तक

क्षितिज को ढूँढता पागल मैं कोई परिंदा हुँ ,
खुद की इस उड़ान पे अब खुद से ही शर्मिंदा हुँ ,
तुम्हें इस बात का कोई इल्म है या भी नहीं ,शायद
तुम्हारे नाम पे मरता , तेरे ही नाम से जिन्दा हुँ ।

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One Comment

  1. Aliya singh February 18, 2018 at 1:40 am

    Gajb….

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