पत्ते- पत्ते हो गये

नीम का डाल बिखर गई

सब पत्ते-पत्ते हो गये

गांव की आत्मा कहां खो गई

चप्पे-चप्पे खोज रहे है,

उलाहना टूटे पंगडडी दे रहे है

आम के मुरछाये चेहरे

खण्डर हो चुके कुऐ

उड़ते धूल तालाब रहे है,

दुखः हुआ

भरे समाज में गांव वाले

गांव की इज्जत लूट रहे है

इसांनियत बिखर गई

मन्दिर-मजिस्द टूट रहे है।

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Abhishek Sharma

अभिषेक राज शर्मा पिलकिछा जौनपुर उप्र•223107

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