मुक़द्दर ने मेरा बोसा लिया है

मुहब्बत का जो मोती पा लिया है

हमेशा आसमां ने इस ज़मीं पर
झुकाकर ख़ुद को यूं फैला लिया है

भरा है सीप का दामन सदा ही
सहारा फ़िर से गौहर का लिया है
( गौहर = मोती )

ठिकाना कर लिया साहिल पे देखो
किनारे ने मुझे अपना लिया है

चमकती रेत पर , तू सीप मेरा
तुझे अपना समझ लिपटा लिया है

समुन्दर दर्द का सारा निहां था
मगर मैंने वही टुकड़ा लिया है

चमत्कारों के पड़कर फेर में यूं
कभी ‘आनन्द’ धोखा खा लिया है

स्वरचित
डॉ आनन्द किशोर
दिल्ली

Say something
Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...