मैं जिंदा हूँ

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मैं जिंदा हूँ

By |2018-02-17T16:18:27+00:00February 17th, 2018|Categories: व्यंग्य|Tags: , , |0 Comments
मैं जिंदा हूँ…क्यूंकि मेरी सांसें चल रहीं हैं और मेरा दिल धड़क रहा है! पर आजकल ज़माना बदल गया है और जिंदा रहने का पैमाना साँसें और धडकन जैसी जीवित चीज़ों से हटकर एक निर्जीव वास्तु कागज पर आ गयी है! जी हाँ आजकल एक कागज़ आपको सूचित करता है कि आप जिंदा हो या नहीं जो कि साक्षात परमेश्वर से नहीं हमारी महामहिम सरकार से आता है जिसमे लिखा होता है कि आप जिंदा हैं या मृत हैं! सरकार ये सोचकर ये कागज़ जारी करती है कि अगर आप जिंदा हुए तो वोट डालने तो ज़रूर आयेंगे और अगर मृत हुए तो आपके नाम से ट्रस्ट खुलवाकर काले पैसों को सफ़ेद कर लेगी!  खैर जिंदा को मृत घोषित कर देना भी सरकारी कागजों का एक खेल है और इसका फायदा अपराधी प्रवृत्ति के लोग बखूबी निभाते हैं! ये लोग अपराध भी करते हैं और बच भी जाते हैं क्यूंकि भारतीय संविधान में भूतों को सज़ा देने का कोई प्रावधान नहीं है!        खैर मृतकों की बात करते हुए याद आया कि हमारे समाज में मृतकों को बहुत सम्मान दिया जाता है और शायद यही बात है कि हम अपने नेताओं का भी बहुत सम्मान करते हैं क्यूंकि बहुतों का ज़मीर तो कबका मर चुका होता है! हमारे समाज में मृत्यु आना तब काहा जाता है जब देह पार्थिव हो जाती है परन्तु सही आयनों में मृत्यु तब आती है जब ज़मीर पार्थिव देह को त्यज देता है! हँसी की बात तो ये हैं कि पह्शन के लिए आपको सरकार को ये प्रमाणपत्र देना होता है कि भाई मैं जिंदा हूँ और कृपया सरकार मुझे मृत मानकर मेरी मेहनत की समस्त कमाई को अपने राजनीति के पुण्य कामों में न लगाए! यदि आप ये प्रमाणपत्र देना आप कभी भूल गए तो काउंटर पर बैठा बाबू जो पिछले १५-२० सालों से आपको पेंशन दे रहा है आपको ये कहकर मना कर देगा कि बाबा! सरकारी कागजों में आप मृत पाए गए हैं और मृतकों को पेंशन नहीं श्रद्धांजलि दी जाती है!
मृतकों का असली सम्मान तो ये ट्रस्टवाले करते हैं हैं भैय्या! जी हाँ! ट्रस्ट यानी सामाजिक उद्धार हेतु जमा किया जानेवाला पैसा जो समाज से चंदे के रूप में लिया जाता है! नाम ट्रस्ट है यानी विश्वास मगर हमारे ट्रस्टों में कई अविश्वसनीय काम होते हैं अभी तो हाल के दिनों में तो हमारे चंद नेताओं ने खाने के सारे रिकॉर्ड तोडते हुए अपंगों की बैसाखियों का हक खा लिया! खैर जाने दीजिए मृतकों को बुरा नहीं कहा जाता अरेरेरे! बताया था न ज़मीर मर चुका है इनका! खैर! तो ट्रस्टों में एक और काम होता है और वो है समस्त काले गोरखधंधों से कमाई काली कमाई को ट्रस्ट में चंदे के नाम से दिखा दीजिए और इस पर श्रद्धा का धवल वाटर ओढाकर आराम से इस्तेमाल कीजिये! इन सब कारणों के बाद भी जनता की भीरुता देखिये ट्रस्ट के नाम मृतकों के नाम पर होते हैं इसलिए इनके बारे में अपशब्द बोलना मतलब अपने पितरों को दुःख पहुंचाना होता है! मन तो मेरा यही कहना चाहता है कि साधू! साधू! आर्यावर्त!
जब भी भारत में कभी प्राकृतिक आपदा आई है, न जाने कितने जीते लोगों को मृतकों के श्रेणी में ले गयी है! हमारे महान सरकारी ढर्रे के महान नर-पुन्गवों ने यहाँ भी अपने “अर्थ” पूर्ण धर्म निभाने का मौका नहीं छोड़ा! कहावत है कि धन समस्त बुराईयों का मूल है इसीलिए हमारे कर्मचारी मृतकों के लिए जारी किये गए सरकारी धन को समस्त पाप का मूल समझते हैं! कहा भी गया है हमारे वेद-पुराणों में कि जब तक पाप का शमन नहीं होता है मोक्ष की प्राप्ति भी तब तक नहीं होती है! अपना सामाजिक धर्म निभाते हुए ये कर्मचारी समस्त पाप को अपने घर और अकाउंट में धर लेते हैं और समस्त मृतात्माओं को मोक्ष दिलवाते हैं!
इतनी पुण्य-परायण सोच रखनेवाले समाज आज के परिवेश में इतना शोषित क्यूँ है यही सवाल मुझे सताता रहता है! देख रहा हूँ मैं कि इतनी लूट और नृशंसता के पश्चात भी कहीं से कोई आवाज़ नहीं आती है शायद हम सब भी मृत-प्रायः ही हो गए हैं! श्वसन सभी का चालू है परन्तु जीवित कोई नहीं है, क्यूंकि ज़मीर ने अंदर से दस्तक देकर बताना बंद कर दिया है कि मैं जिंदा हूँ! अगर आज के परिदृश्य में गोस्वामी तुलसीदास जिंदा होते तो अपनी पंक्ति “समरथ को नहीं दोष गुसाईं!” को बदलकर “मिरतक को नहीं दोष गोसाईं!”  कर देते क्यूंकि इतने सारे अपराध चंद मृतकों द्वारा इस मृत समाज में ही तो किये गए हैं!
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ek shikshak jisey likhne ka shauk hai

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