ऊंट की दुर्गति

Home » ऊंट की दुर्गति

ऊंट की दुर्गति

By |2018-01-20T17:07:38+00:00December 22nd, 2015|Categories: पंचतन्त्र|0 Comments

किसी  जंगल में मदोत्कट नाम का एक शेर रहता था | चीता, कौआ और गीदड़ उसके सेवक थे | एक बार उन्होंने अपने साथियों से छूटा इधर-उधर घूमता हुआ क्रन्थनक नामक ऊंट देखा | शेर ने कहा- “यह तो अपूर्व जीव है | इसका पता लगाओ कि यह जंगली है या ग्रामवासी |”

यह सुनकर कौआ बोला- “स्वामी! यह ग्रामवासी ऊंट है | या आपके भोजन के योग्य है | इसका वध कर डालिए |”

शेर बोला- “नहीं, मैं घर आये मेहमान को नहीं मारता | यह विश्वाश करके मेरे वनक्षेत्र में आया है | विश्वाश करके बिना डरे घर आए शत्रु को भी कभी नहीं मारना चाहिए | यदि कोई ऐसा करता है तो वह पाप का भागी होता है | तुम इसे अभयदान देकर मेरे पास ले आओ | मैं इससे जंगल में आने का प्रयोजन पूछूँगा |”

सेवक क्रन्थनक नाम के उस ऊंट को शेर के पास ले आये | ऊंट शेर को प्रणाम करके एक ओर बैठ गया | शेर के पूछने पर उसने बताया कि वह अपने साथियों से बिछुड़ कर जंगल में अकेला रह गया  है |

उसकी दुःखभरी कहानी सुनकर शेर ने कहा- “क्रन्थनक! तुम वापस जाकर भी गाँव में बोझ ढोने का ही तो काम करोगे | अब इस कष्ट को मत उठाओ | इस जंगल में ही रह कर ताजी हरी घास चरो और निर्भय होकर आनंद से रहो |”

शेर का आश्वसन पाकर ऊंट सुखपूर्वक वन मिएँ विचरण करने एक दिन महोत्कट नाम के उस शीर और एक जंगली हाथी में लड़ाई हो गई | हाथी के दांतों से वह घायल हो गया और चलने-फिरने में असमर्थ हो गया | अब वह शिकार पर जाने के योग्य नहीं रहा | शेर के अशक्त हो जाने से भोजन के आभाव में उसके सेवक भूखे मरने लगे | क्योंकि जब शेर शिकार करता था, तो उसके सेवकों को भी उसमें से हिस्सा मिला करता था | अब तो वह स्वयं भी शिकार करने में असमर्थ था और भूख से परेशान हो रहा था | अपनी और अपने सेवकों की दशा देखकर शेर ने कहा- “किसी ऐसे प्राणी को ढूंढ कर लाओ जिसको मारकर मैं अपना और तुम्हारे भोजन का प्रबंध कर सकूँ |”

यह  सुनकर उसके उसके तीनों सेवक शिकार की तलाश में इधर-उधर घूमने लगे | लेकिन काफी प्रयास के बाद भी उन्हें कोई शिकार नहीं दिखाई दिया | तब कौए और गीदड़ ने आपस में मंत्रणा की | गीदड़ बोला- “अब इधर-उधर भटकने से कोई फायदा नहीं है | क्यों न इस ऊंट को ही मारकर अपनी भूख मिटाई जाए ?”

कौए ने कहा- “बात तो तुम ठीक कहते हो, लेकिन स्वामी उसे अभयदान दे चुके हैं | इसलिए वह वध के योग्य  नहीं है | “

गीदड़ बोला- “भाई तुम चिंता मत करो | मैंने एक ऐसा उपाय सोच रखा है कि जिससे स्वामी उसे मारने में मजबूर हो जायेंगे |”

तब गीदड़ ने शेर के पास जाकर कहा- “स्वामी हमने सारा जंगल छान मारा, लेकिन कोई पशु हाथ नहीं लगा | अब तो हम सभी इतने कमजोर हो गए हैं कि एक कदम भी नहीं चला जाता | आपकी दशा भी ऐसी ही है | अगर आपकी आज्ञा हो, तो इस ऊंट को ही मार कर उससे भूख शांत की जाए |”

यह सुनकर शेर को क्रोध चढ़ आया | उसने कहा- “तू पापी और अधम है | तुझे धिक्कार है! जिसे मैंने अभयदान दिया है, उअसे ही मसार डालू ?”

गीदड़ बोला- “स्वामी! आपने अभयदान दिया है, इसलिए यदि आप उसे मारेंगे तो आपको पाप लगेगा | लेकिन यदि वह अपने आप ही वध के निमित्त आपके चरणों में आत्मसमर्पण कर दे, तब आपको कोई पाप नहीं लगेगा | यदि ऐसा संभव न हो तो लोगों में से किसी एक को मार डालिएगा | अगर हमारे प्राण स्वामी! के काम नहीं आते हैं तो इस जीवन का क्या लाभ ?”

गीदड़ की बात सुनकर शेर राजी हो गया | उसने कहा-“यदि तुम्हारा ऐसा ही विश्वाश है तो मुझे इसमें कोई आपत्ति नही है |”

तब गीदड़ ने अपने सभी साथियों से जाकर कहा- “भाइयों, हमारे स्वामी की दशा बहुत चिंतनीय है | अगर वह जीवित नहीं रहे तो हमारी रक्षा करने वाला कोई नहीं रहेगा | इसलिए हम लोगों को भूख से व्याकुल अपने स्वामी की सेवा में अपने-अपने शरीर को समर्पित कर देना चाहिए |”

गीदड़ की बात सुनकर चीता, कौआ आदि सहमत हो गए और शेर के पास चले गए | सिंह ने पूछा- “कोई शिकार मिला ?”

तब कौआ बोला- “स्वामी! हमने इधर-उधर बहुत खोजा, लेकिन कुछ नहीं मिला | इसलिए मैं अपने आपको समर्पित करता हूँ | मेरा भोजन करके आप अपने प्राणों की रक्षा करे, ताकि मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो |”

तभी गीदड़ ने कौए की बात काट दी और बोला- “बोला अरे मित्र, तुम तो शरीर से बहुत छोटे हो | तुम्हारे मांस से स्वामी का पेट तो भरेगा नहीं, उलटे उन्हें जीव-हत्या का पाप लग जाएगा इसलिए तुम हट जाओ | तुमने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया | मैं स्वामी की सेवा में अपने को समर्पित करता हूँ | मुझे खाकर अपनी भूख मिटाएं |”

गीदड़ की बात सुनकर चीते ने कहा- “भाई, तुम्हारी बात तो ठीक है, लेकिन तुम भी छोटे शरीर के प्राणी हो | तुम्हारे नाख़ून बहुत जहरीले हैं, इसलिए तुम भोजन के योग्य नहीं हो | इसलिए तुम भी हटो | मैं अपने आपको स्वामी को समर्पित करता हूँ | मुझे खाकर उनकी भूख शांत हो जाएगी | और मुझे पुण्य लाभ मिल जाएगा |”

उन तीनों की ऐसी बातें सुनकर ऊंट ने सोचा- “इन तीनों ने अपना-अपना शरीर स्वामी को प्रस्तुत किया, लेकिन स्वामी ने किसी का वध नहीं किया | इसलिए मुझे भी निवेदन करना चाहिए | यह सोचकर उसने चीते को आगे से हटाकर निवेदन किया- “ये सभी प्राणी आपके भोजन के योग्य नहीं है | इसलिए मेरा भोजन करके आप अपने प्राणों की रक्षा कीजिये | इससे मेरे दोनों लोक सुधर जायेंगे |”

तब शेर का इशारा पाकर गीदड़ और चीते ने अपने तीक्ष्ण नाखूनों से ऊंट का पेट फाड़ डाला | फिर सबने उसके मांस से अपनी भूख शांत की |

यह काठ सुनाकर संजीवक दमनक से बोला- “मैं अच्छी तरह समझ गया हूँ कि तुम्हारे राजा के परिवार में क्षुद्र लोग भरे पड़े हैं | सज्जनों को ऐसे व्यक्ति की सेवा नहीं करनी चाहिए | निश्चय ही किसी दुर्जन ने उसे मेरे प्रति भड़का दिया है | इसलिए तुम्ही बताओ, अब मैं क्या करूँ ?”

दमनक बोला- “मेरा तो इस विषय में यही विचार है कि ऐसे स्वामी की सेवा करने का कोई लाभ नहीं है | अच्छा है तुम यहाँ से चले जाओ और किसी दूसरे वन में जाकर अपना निवास बनाओ | ऐसी उल्टी राह पर चलने वाले स्वामी का परित्याग कर देने में ही भलाई है |”
संजीवक बोला- “स्वामी के नाराज होने पर भी मैं और कहीं नहीं जा सकता और न दूसरी जगह जाने से मुझे कोई लाभ होगा | इसलिए मेरे सामने युद्ध के अतिरिक्त कोई दूसरा रास्ता नहिओ है |”

यह सोचकर दमनक ने फिर उससे कहा- “आपका कहना ठीक है, लेकिन स्वामी और सेवक की लड़ाई अनुचित है | जो व्यक्ति अपने शत्रु के बल और पराक्रम को पूरी तरह समझे बिना उससे लड़ता है, उसे उसी प्रकार पराजय का सामना करना पड़ता है जैसे टिटहरी से समुन्द्र को पराजय का सामना करना पड़ा |”

संजीवक की जिज्ञासा शांत करने के लिए दमनक ने तब उसे टिटिहरी और समुन्द्र संबंधित यह कहानी सुनाई |

– विष्णु शर्मा

Say something
No votes yet.
Please wait...

About the Author:

Leave A Comment