सागर जैसा साहित्य

पवन गति सा जो मैं उड़ती
साहित्य प्राप्ति बनी लालसा
गघ पघ को जब पहचाना
होश हवास उड़ गये मेरे
जिसको जाना निर्मल झरना
अंतहीन वह सागर निकला
मन की सोच जब भी लिखती
व्याकरण के घेरे में आ जाती
मात्रा जब बनती लेखनी
हास्य व्यंग्य सा मुझसे करती
अलंकारों को जब सजाती
मैं बन जाती देशी नारी
मुहावरों को भाषा बनाती
मिट्टी का सा कण बन जाती
#नीरजा शर्मा # शुभरात्रि

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