महाभारत

* * * महाभारत * * *

मेरी पुत्री जो कि अध्यापिका है उसने मुझे महाभारत के किसी प्रसंग को लेकर एक लघु काव्य नाटिका लिखने को कहा ।

मैंने द्रोपदी के पुत्रों की निर्मम हत्या से जुड़े प्रसंग को लेकर जो लिखा वो आपके सामने प्रस्तुत है ।

आपके दिल को छुए तो दिल से शाबाशी देवें ।

* * * ममता का पटबीजना * * *

मानव मन पपीहा डोले
जगी ज्ञान की की प्यास
बादल बनकर बरस रहे
महर्षि वेद व्यास ।

सूरज धरा से मिल रहा
अंखियों का निरा भरम है
जीवन का कारण रश्मियां
धरती का धीरज धरम है ।

क्शीरसागर शेष शैय्या
प्रसव उपरान्त सृष्टि रचैया
मुस्का रहे ! सुस्ता रहे !
चरण दाबती नारायणी मैया ।

कई कल्प कटे मनवन्तर बीते
जुग द्वापर आया इक बार
लोकहित को गीता कहने
आए केशव विष्णु अवतार ।

कुरुवंश में अंधा राजा
अंधी पुत्रमोह भावना
पाण्डु – पुत्र वनों में भटकें
अवांछित – कुत्सित कामना ।

लोभ – मोह – अहंकार के हाथों
घर – आंगन कलह का बीजना
धन – सम्पत्ति – सत्ता का मद
प्रेम – चदरिया छीजना ।

न्याय – तुला समकोण में पलड़े
विषम हास – परिहास
नियति – नियन्ता हैं गम्भीर
प्राची रक्तवर्ण आभास ।

मुरलीधर समझा रहे
जब बंद हों सभी द्वार
हे अर्जुन ! खड्ग उठा और धर्म निभा
मरे हुओं को मार ।

तू न था तेरी दुविधा न थी
जब नहीं थे यह सारे लोग
न मिलना न मिल बैठना
न कोई दु:खद वियोग ।

तब भी मैं था अब भी मैं हूं
मुझमें अखिल ब्रह्मांड
मुझमें आकर मिल रहे
सभी सुयोग सब कांड ।

इस जन्म में उस जन्म में
यही धरती यही आकाश
झोली जितना मिल रहा
सबको बिन प्रयास ।

उठ कौन्तेय ! कर्म कर
मुझ संग बांध तू डोर
मेरा हो जा मुझमें आ जा
फल की चिन्ता छोड़ ।

अस्त्र चले ब्रह्मास्त्र चले
चले तीर पर तीर
मानव – रक्त बहा ऐसे
जैसे नदिया नीर ।

द्रोणपुत्र की बुद्धि पर
तभी हुआ वज्र का पात
द्रोपदी – पुत्र सोए हुए
मार दिए कर घात ।

रंगे – हाथ पकड़ा गया
नीति – नियम का चोर
कोई कहे चीरो छाती इसकी
कोई बोले गर्दन तोड़ ।

तभी द्रोपदी शीश उठाया
सर्पिणी – सी लहक रही
नयनों का नीर चुक गया
छाती में अग्नि धधक रही ।

हे धर्मराज ! हे कृष्ण मुरारी !!
हे महाबली ! हे धनुर्धारी !!
हे माद्रीपुत्रो ! सबके रहते
मेरे सीने लगी विष – बुझी कटारी ।

तड़प रही मैं सिसक रही मैं
न मरी मैं न मैं जीती
न मैं चाहूं मुझ – सी कोई
मां दिखे जीवन – विष पीती ।

छोड़ दो ! इसे छोड़ दो !!
सारे बंधन तोड़ दो

यशोदानन्दन ! हे वासदेव !!

मेरी विनती इसे अमर कर दो
मस्तक – मणि को फोड़ दो ।

फूटे मस्तक भटक रहा अश्वत्थामा
मिला त्रास को त्रास
कथा कहें संसार की
महर्षि वेद व्यास ।

छाती छेद करा कर बोलती
मन में करती वास
जननी ऐसी बांसुरी
ज्यों आते – जाते श्वास ।

सावन मास उजियारे दिन
एकम – दूजम – तीजना
धरती मां अलसा रही
न हल जुते न बीजना ।

मन – मंदिर में प्रेम का दीपक
तिमिर दूर – से – दूर उलीचना
बिन मात बिलख रहा शिशु
गऊ माता का पसीजना ।

क्शुधित – व्यथित संतान हो
मां का आंचल भीजना
घोर अंधेरे दिप – दिप दिप – दिप दमक रहा
ममता का पटबीजना ।

पिता प्रेम – प्याला मीठा
मीठी उसकी बात
जननी नदिया बावरी
सबकी बुझावे प्यास ।

ताप में संताप में
सब सुलग रहे हों गात
किनमिन – किनमिन बरस रही
बन बरखा तेरी – मेरी मात ।

मन में पीर हो अधीर हो
या हो काली रात
चंदा – तारों के तले मां
चमके बन परभात ।

३-९-२०१६ वेदप्रकाश लाम्बा

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