पंचायत

“अरी कलमुँही यह क्या कर दिया तुमने? किस पाप की सज़ा दी है। ”

“भाग्यवान क्यों डाँट रही हो सुधा को? क्या हुआ है ऐसा!”

“सुधा के बापू हम तो कहीं मुँह दिखाने लायक न रहे।यह कलमुँही अपना मुँह काला कर आई है। और बताने को भी तैयार नहीं की कौन था वो मर्दुत।सुबह खेत पर गयी थी ।वो पड़ोस वाली ऊषा लेकर आई है इसको।कुछ बोल भी नहीं रही।”

“हे भगवन!यह क्या सुन रहा हूँ मैं। पर यह बात पंचायत में रखनी तो होगी न। ऐसे चुप तो नहीं बैठ सकते।मैं कल ही जाऊँगा।”

“नहीं बाबा,मुझे न्याय पंचायत में न मिलेगा ।वहाँ न जाऊँगी मैं।”

“अरी मुर्ख,अपने सरपंच भले आदमी हैं। उनके न्याय का डंका आस पास के गाँवों में भी हैं।तुझे जाना ही होगा।”

सरपंच का नाम सुनते ही सुधा चिल्ला उठी

“नहीं……..कभी नहीं । न्याय की कुर्सी पर बैठने वाला हरदम न्यायाधीश नहीं होता….।”

– कल्पना भट्ट

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