बचपन

बचपन

कंचन की ललक, कंचन का भार,

कर रहे हैं आज हमें लाचार|

तब मन के मंच पर आकार बचपन,

खोलता  स्मृतियों का प्रशस्त द्वार||१||

ये तामझाम! ये चकाचौंध!

ये  वैभव विलास का प्रदर्शन विराट्|

भरते मन में कलान्ति सदा,

ये शोहरत के खेल ! ये ठाठ बाट||२||

धन-धाम के मिथ्याडम्बर,

के चक्रवियु में घिर- घिर कर |

सिकुड़ रहा आज है बचपन,

रो रहा आज वह सुबक -सुबक कर ||३||

माटी की महक , चंदा की चमक,

नंदनवन का यह दिव्य- सुमन,

विधना के कर की कीर्ति अनुपम,

है बसुधा का श्रृंगार  बचपन||४||

न द्वेष दंभ  का तनिक लेश,

सबके लिए ममता  अशेष ,

लुटा कर मधुबोल के सौगात,

हरता जन-मन का क्लेश ||५||

माँ के आँचल  का मधु- बयार ,

करता नैनों मे  निद्रा  संचार ,

कभी आता चंदा  बनकर मामा,

स्नेह-सुधा  का लाता  उपहार ||६||

बढ़ रहे अपेक्षाओं का अम्बार,

कंधे पर बस्ते का भार|

फिर भी चल रहा बचपन ,

करने स्वजनों के स्वप्न साकार||७||

– सुबल चन्द्र राय “सुधाकर”

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