धरती माँ हमारी है

। । ओ३म् । ।

* _आज सत्ता के सूत्र जिन हाथों में हैं, उनकी सभी बातों अथवा कामों से पूर्णतया सहमत न होते हुए भी हमारी चाहत यह है कि कम-से-कम पन्द्रह वर्ष इन्हें अपने मन की कहने और करने के लिए मिलने चाहिएं ।_

_ऐसी चाहत क्यों है ? इसी का उत्तर देने का एक प्रयास है प्रस्तुत कविता :_

* * * धरती माँ हमारी है * * *
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हिलती है यह जब धरती
छोटे – बड़े कई पेड़ गिरते हैं
स्याने सहेज लेते हैं घर
जब – जब बादल घिरते हैं
गंदगी और बिखरती है जहाँ
सिर पर माई – बाप न हो वहाँ
सुअर आवारा फिरते हैं

हिलती है यह जब धरती . . . . .

हिलाने को यह माँ धरती
इक पागल ने वन जला डाला
सत्ता के नशे में चूर
जन – जन का मन जला डाला
आपदा की चली यूँ आँधियाँ
खून से सन गईं सब वादियाँ
गुरु का घर हिला डाला

हिलाने को यह माँ धरती . . . . .

धरती हिल उठी उस चोरी से
शिखंडी जब आगे धर लिया
मूरख के हाथ में दे उस्तरा
सब मनचाहा कर लिया
सपनों की मची तब लूट में
सच को डुबोया झूठ में
अपना अपनों का घर भर लिया

धरती हिल उठी उस चोरी से . . . . .

धरती को हिला कर छोड़ेगी
मेंढकी को ज़ुकाम अब हो गया
संक्रमणकाल के रंग में
रंग उसका अपना खो गया
हुड़दंग मचाकर टोले में
करने में नहीं बस बोले में
अभी – अभी कोई सो गया

धरती को हिलाकर छोड़ेगी . . . . .

धरती को हिलाने की
जो मन में ठान बैठे हैं
स्यानी हुई नहीं दुनिया
जो अब तक मान बैठे हैं
राहें खुल चुकी हैं नई नई बहारों की
दिखने लगी दुनिया नई चाँद – सितारों की
बुद्धि के बैरी भी सच्चाई जान बैठे हैं

धरती को हिलाने की . . . . .

धरती हिल उठी यह जानकर
विकास हुआ पागल
पागल की बातें पागलपन की
पागल का विश्वास है पागल
पागलों की दुनिया का सरताज है
सभी पागलों को उस पर नाज़ है
पागल घराने का युवराज है पागल

धरती हिल उठी यह जानकर . . . . .

धरती माँ हमारी है
इसे हिलने नहीं देंगे
पागलों के फेर में
पेड़ कोई अब गिरने नहीं देंगे
दिन और रात बदलते हैं
हम सब होकर एक निकलते हैं
दुर्युक्तियों से धरती अपनी चिरने नहीं देंगे

धरती माँ हमारी है . . . . . !

११-१०-२०१७

_-वेदप्रकाश लाम्बा_
_९४६६०-१७३१२_

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