हम जंगल में बहक गये !

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हम जंगल में बहक गये !

चहका -होली गीत

हम जंगल में बहक गये !

निमिष-निमिष साँसें सम्मोहित हम जंगल में बहक गये।

लेकर पुरवा आयी आमंत्रण
फाग सजाया है उर कानन
नेह निमंत्रण पा अचपल मन
हुआ चपल हम मचल गये …!

निमिष-निमिष साँसें समोहित,हम जंगल में बहक गये ।

तरुणी लता तरु आलिंगन
पात -पात में चुम्बन-चुम्बन
फूल-फूल कीलाल बाँटते
ख़ुशबू-ख़ुशबू रोली चंदन
अभिहासों से पटी हवाएं
यौवन गाती सी मंज्ञ़रियां
आंगन-आंगन शज़र-नगर में
महकी पसरी मदमत्त सी दुनियां !

हम रोक न पाये मनोवेग को, ललचाये से लपक पड़े ,
निमिष-निमिष साँसें सम्मोहित हम जंगल में बहक गये ।

तजते-गहते पैर विहग के
मृदु गान उर में भर-भर के
डैने- डैने प्रीत संदेशे
प्रेम-पत्र के शब्दों जैसे
आसमान में छोड़–छोड़ कर
नभ धरती को जोड़ -जोड़ कर
खुले अधर ,मद-मदिर-कलरव
कंठ जिह्वा सुर-सरित लवालब !

चह चह में चित चहका,चहका ,सुन-सुन कर खुद चहक गये ,
निमिष-निमिष साँसें सम्मोहित हम जंगल में बहक गये ।

हृद पिचकारी फाग बाग में
भ्रमर-भ्रमरी व्रज-राग में
चंचल-चंचल चित चितवन से
अनुराग ले मुग्ध मगन से
बाँटती भ्रमरावली भ्रमरज
हलधर केशव दोनों अग्रज
उम्र -भेद नहीं हर्ष-प्यार में
तुल्य गुलाल फागुनी वयार में
जीव-जीवड़ा मग्न बंजारन
गाछ-गाछ, एक-एक वृंदावन ।

बुटा-बुटा, शतदल-शतदल, दृष्ट राधिका ! ठिठक गये!
निमिष-निमिष साँसें सम्मोहित,हम जंगल में बहक गये।

जली नहीं पर कोई होलिका
अगन नहीं आधार होली का
खुशियों के सरदल पर पहरे
दुबके ठिठके गुंगे बहरे
अहं-द्वेष,वैर,ईर्ष्या-मत्सर
भागे-भागे हुये निरुत्तर
कोंपल-कोंपल चढी जवानी
मगन मस्त मदयंती रानी
कलुष-भेद- तम-पतझड़ झूठा
सुर्ख गुलाबी विजय,अनूठा !

मिलन सती शिव! खल मुक्ति सुख!,बेमतलब सब सबक गये,
निमिष-निमिष साँसें सम्मोहित ,हम जंगल में बहक गये ।

-पंकज कुमार वसंत

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