सिकुड़ा हुआ समय

पृथ्वी की धुरी के इशारों पर

यूं तो नाचता है समय…

विस्मृत क्षण हो गए धूमिल

कई दिनों से गुम था समय…

कितने ही वर्षों से ढूंढता

पूछता था जिससे वो कहता

“मेरे पास तो नहीं है समय…”

समय को खोजते खोजते

अपने प्रियजनों के हृदय की

सीमा को भी लांघ गया…

कहीं भी ना मिला समय….

हार के लौटा घर में,

आश्चर्यचकित फिर हुआ मैं !!

समय तो मेरी मुट्ठी में सिकुड़ा था

मेरे परिवार के हर सदस्य से

मिलने को आतुर था – मेरा समय ||

No votes yet.
Please wait...

Dr Chandresh Kumar Chhatlani

नाम: डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी सहायक आचार्य (कंप्यूटर विज्ञान) पता - 3 प 46, प्रभात नगर, सेक्टर - 5, हिरण मगरी, उदयपुर (राजस्थान) - 313002 फोन - 99285 44749 ई-मेल -chandresh.chhatlani@gmail.com यू आर एल - http://chandreshkumar.wikifoundry.com ब्लॉग - http://laghukathaduniya.blogspot.in/ लेखन - लघुकथा, कविता, ग़ज़ल, गीत, कहानियाँ, बालकथा, बोधकथा, लेख, पत्र

Leave a Reply

Close Menu