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By |2018-02-28T22:39:34+00:00February 28th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |4 Comments

आज फिर तुमसे

बात करने का मन करता है।

इकरार-ए- मोहब्बत को

इज़हार करने का दिल करता है।

जानती हूँ मैं,

मुझसे तुम बहुत दूर हो।

चाहते हुए भी

इस पल आ नहीं सकते।

फिर भी क्यों,

तुम्हें देखने का दिल करता है ?

क्या करूँ मैं ,

बहुत समझाया इस नादान को।

सिर्फ़ तुम्हारे क़रीब,

रहने का दिल करता है।

कैसी है लगन,

यह मेरे मन को लगी ।

सुबहो शाम तुमको

ही याद करने का दिल करता है।

–डा० उपासना पाण्डेय😊

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About the Author:

परास्नातक,संस्कृत, इ०वि०वि०।(लब्ध -स्वर्णपदक) डी०फिल०, संस्कृत विभाग, इ०वि०वि०।

4 Comments

  1. Subodh उर्फ सुभाष March 1, 2018 at 11:41 am

    ये चाहते होती ही ऐसी है
    जो अक्सर याद आती है

    बहुत अच्छे से अपनी भावनाएं लिखी

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  2. Pallo March 3, 2018 at 7:56 am

    Nice Mam

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  3. Anshul March 9, 2018 at 8:12 pm

    Loved it…

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  4. Upasana Pandey March 28, 2018 at 3:56 pm

    सुबोध, पालो एवं अंशुल जी उत्साहवर्धन हेतु बहुत बहुत धन्यवाद ।

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