आज फिर तुमसे

बात करने का मन करता है।

इकरार-ए- मोहब्बत को

इज़हार करने का दिल करता है।

जानती हूँ मैं,

मुझसे तुम बहुत दूर हो।

चाहते हुए भी

इस पल आ नहीं सकते।

फिर भी क्यों,

तुम्हें देखने का दिल करता है ?

क्या करूँ मैं ,

बहुत समझाया इस नादान को।

सिर्फ़ तुम्हारे क़रीब,

रहने का दिल करता है।

कैसी है लगन,

यह मेरे मन को लगी ।

सुबहो शाम तुमको

ही याद करने का दिल करता है।

–डा० उपासना पाण्डेय😊

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