ताजमहल मंदिर भवन था

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ताजमहल मंदिर भवन था

। । ओ३म् । ।

* *आज देश का (विशेषकर उत्तर प्रदेश का) शासन चला रहे लोगों में बहुतेरे ऐसे भी हैं जो कि बुद्धि के पीछे लठ्ठ लिए पिले पड़े हैं ।*

*एक ज़िद यह भी है कि “सिद्ध करके छोड़ेंगे कि विदेशी आक्रांता – लुटेरे इस देश में ध्वंस नहीं निर्माण करने आए थे; और निर्माण भी ऐसा कि जिसे देखकर दुनिया दाँतों तले अंगुली दबा ले ।”*

*अनपढ़ता – मूढ़ता – मूर्खता को समर्पित यह कथित देश – धर्म हितैषी यह भी नहीं जानते कि तेजोमहालय के सुन्दर – धवल मुख्य द्वार को अरबी लिपि से भ्रष्ट करने व दूसरी तोड़ – फोड़ करने के लिए मचान बाँधने के लिए स्थानीय जनता ने लकड़ी देने से मना कर दिया था । तब मचान ईंटों की बाँधनी पड़ी ।*

*नीचे औरंगज़ेब के जिस पत्र की चर्चा है , उसी पत्र में वो लिखता है कि “बरसात के इस मौसम में चारों ओर पानी ही पानी है । परंतु, आश्चर्य है कि नदी (यमुना) माँ के मकबरे से हटकर बह रही है । ” वो लोग उस जगह से आए थे जहाँ शौच के बाद धोने को पानी नहीं मिलता । वो पानी के प्रबंधन को क्या जाने ?*

*तेजोमहालय के पीछे यमुना में तलहीन कुएं बने हैं, जो अधिक पानी होने पर उसे नीचे धरती में पहुंचा देते हैं ।*

*शाहजहाँ ही नहीं, उसके अंतिम वारिस तक किसी ने भी ‘ताजमहल’ शब्द का कहीं भी प्रयोग नहीं किया है ? क्योंकि ऐसा करने से ‘तेजोमहालय’ की चोरी खुल जाती । वे उसे मुमताज़ – उल – ज़मानी का मकबरा ही कहते रहे ।* *

*आप पूरा लेख पढ़ें :–*

* _(यह लेख उत्तर प्रदेश की महाबुद्धिमान सरकार की सेवा में सादर समर्पित है ।)_ *

* * * *ताजमहल — तेजोमहालय शिवमंदिर है* * * *

हमारा देश भारत एक हज़ार दो सौ पैंतीस वर्ष तक निरंतर विदेशी दासता में जकड़ा रहा । इस कारण हमारे देश की संस्कृति व इतिहास को न केवल विकृत किया गया अपितु इसके स्थान पर दूषित विचारों को स्थापित करने की कुचेष्टा भी की गई । देश का दुर्भाग्य कि विदेशी दासता से मुक्ति के बाद सत्ता जिन हाथों में आई वे मानसिक रूप से आज भी गुलाम हैं । यही कारण है कि सत्य सामने स्पष्ट दीखने पर भी उससे मुंह चुराया जा रहा है । इसका एक उदाहरण है — ताजमहल !

ताजमहल मंदिर भवन है इसके सैंकड़ों सबूत ताजमहल में आज भी मौजूद हैं ।

* अफगानिस्थान से अल्जीरिया तक किसी भी अरब या इस्लामी देश में ‘महल’ नाम से एक भी भवन नहीं है । ‘महल’ अथवा ‘ताजमहल’ संस्कृत भाषा का शब्द है ।

* ‘मुमताज़ – उल – ज़मानी’ शाहजहां की न पहली पत्नी थी न आखिरी ।

* कुछ जानकारों का यहां तक कहना है कि उस नीच व्यक्ति के जहॉंआरा नाम की अपनी ही बेटी के साथ अनैतिक सम्बन्ध थे । और जब बात सार्वजनिक हो गई तो मुल्लाओं की बैठक बुलाई गई ; जिसने यह निर्णय दिया कि पेड़ लगाने वाले को फल खाने का अधिकार है ।

* मुमताज़ से उसके प्रेम का केवल एक प्रमाण मिलता है कि अठ्ठारह वर्ष से कम के वैवाहिक जीवन में वो उसके चौदहवें बच्चे को जन्म देते समय मर गई ।

* उसके पिता जहांगीर ने अपने दरबारी लेखक से ‘जहांगीरनामा’ में लिखवाया कि “शाहजहां नशेड़ी, व्यभिचारी, गैर-ज़िम्मेदार और बड़ों का अनादर करने वाला है ।” उस धूर्त ने अपने दरबारी लेखक से ‘जहांगीरनामा’ पुन: लिखवाया और उसमें अपनी प्रशंसा लिखवायी ।

* शाहजहां का दरबारी लेखक मुल्ला अब्दुल हमीद लाहौरी ‘बादशाहनामा’ में लिखता है “‘मुमताज़-उल-ज़मानी’ को दफनाने के लिए राजा जयसिंह से मानसिंह का महल लिया गया और बदले में उसे ज़मीन का एक टुकड़ा दे दिया गया ।”

* मुमताज की एक कब्र बुरहानपुर में आज भी मौजूद है, जहां उसकी मौत हुई थी ।

* ताजमहल के गुंबद पर कमल की आकृति और त्रिशूल इसके शिव मंदिर होने के स्पष्ट प्रमाण हैं ।

* ताजमहल के मुख्य कक्ष में जहां कब्र बनी है, छत के समीप बेल-बूटों के बीच एक सौ आठ बार ‘ओ३म्’ अंकित है ।

* ताजमहल परिसर के एक कक्ष को ‘जिलोखाना’ (रंगमहल) कहा जाता है । जहां नृत्य-संगीत होता है । इसका कब्र में होने का क्या औचित्य है ?

* ताजमहल परिसर में ‘नक्कारखाना’ भी है । जहां नगाड़ा, तुरही आदि वाद्य रखे जाते हैं । इसका मंदिर में उपयोग समझ में आता है । परंतु, कब्र में इसका क्या काम ?

* ताजमहल परिसर में अश्वशाला व बाज़ार भी है । कब्र में इनका कोई उपयोग नहीं, परंतु, मंदिर में यह आवश्यक हैं ।

* ‘महल’ उस भवन को कहा जाता है जहां किसी राजा-महाराजा अथवा धनवान व्यक्ति का निवास हो, न कि कब्र को ।

* फ्रांसीसी यात्री बर्नियर लिखता है कि शाहजहाँ की पत्नी की पहली बरसी पर वो बादशाह के परिवार के साथ मुमताज़ के मकबरे पर गया ।

उसने लिखा है कि “वहाँ चाँदी के किवाड़ , सोने के कंगूरे और स्थान – स्थान पर बहुमूल्य रत्न जड़े हुए थे ।” उस भवन की इसी भव्यता ने शाहजहाँ को राजा जयसिंह से यह भवन छीनने को प्रेरित किया ।

* औरंगज़ेब का एक पत्र संग्रहालय में सुरक्षित है । जिसमें वो अपने बाप को लिखता है कि “दक्षिण की ओर जाते हुए वो आगरा में माँ के मकबरे पर गया था । वहाँ छत टपक रही थी । जिसकी मैंने मुरम्मत करवा दी है । कुछ और मुरम्मत भी होनी चाहिए । ” यह पत्र भी मुमताज़-उल-ज़मानी की मौत के तुरंत बाद का है ।

* जयपुर संग्रहालय में शाहजहाँ की ओर से राजा जयसिंह को लिखे पत्र सुरक्षित पड़े हैं । एक पत्र में वो लिखता है कि “कुछ पत्थर और कारीगर भेजो । और, यह मेरा तीसरा पत्र है ।”. यह पत्र भी मुमताज़-उल-ज़मानी की मौत के तुरंत बाद लिखे गए हैं ।

राजा जयसिंह ने न पत्थर भेजा और न कारीगर । नतीजा, ताजमहल की ऊपरी मंज़िल में जाइए । वहाँ कुछ कमरों के फर्श से पत्थर उखड़ा हुआ है । वही पत्थर कब्र पर लगाया गया है ।

यदि कोई यह कहे कि “अगर शाहजहां ने मंदिर भवन का दुरुपयोग कर उसे मकबरा बना ही दिया तो उसे वैसा ही क्यों न रहने दिया जाए ? गढ़े मुर्दे उखाड़ने से क्या लाभ ?”

तो जान लीजिए कि इतिहास विगत को कुरेदने से न कम है न ज़्यादा । यह अनुचित होता तो कानून द्वारा प्रतिबन्धित होता । जबकि दुनिया के किसी देश में ऐसी मनाही नहीं ।

लखनऊ संग्रहालय में ‘बटेश्वर शिलालेख’ नाम से एक शिलापट्ट पड़ा है । उसके कुल चौंतीस में से तीन श्लोकों में बताया गया है कि ग्यारहवीं शताब्दी के राजा परमर्दिदेव ने श्वेत पत्थर के दो सुंदर भवन बनवाए । एक भगवान शंकर के मंदिर के लिए और दूसरा अपने रहने के लिए । दूसरा भवन आज एतमादुदौला का मकबरा कहलाता है ।

तो अब ?

अपने समाचार-पत्र के सम्पादक को एक पोस्टकार्ड लिखें कि “वे भारत सरकार से मांग करें कि ताजमहल के नीचे की मंज़िलों के रास्तों को खोला जाए । और दुनिया को बताया जाए कि नीचे क्या छुपाया गया है । और, इस सारे कार्य की वीडियोग्रफी करवाई जाए ।

” पोस्टकार्ड पर कम-से-कम पांच व्यक्तियों के हस्ताक्षर के साथ-साथ पूरे नाम-पता व फोन नम्बर भी हों ।”

_(विश्वविभूति पुरुषोत्तम नागेश ओक जी के शोधग्रंथ पढ़ें ।)_

*—वेदप्रकाश लाम्बा*
९४६६०-१७३१२

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