बढ़ना है तुम्हें आगे

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बढ़ना है तुम्हें आगे

बढ़ना है तुम्हें आगे
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माना कि वक्त मुँह जोर है ||
मुसीबतों का शोर है ||
ले जुर्रत इन लहरों से,
डरना नहीं ,बढ़ना है तुम्हें आगे ||

माना कि तू अकेला है ||
अपनें ने ही धकेला है ||
ले उम्मीद इन थपेड़ों से ,
थकना नहीं ,बढ़ना है तुम्हें आगे ||

शंकाओं से भरा मन है ||
शिथिल हो चुका तन है ||
ले बल इन टूटे सपनों से
रुकना नहीं ,बढ़ना है तुम्हे आगे ||

माना की राह कंटीला है ||
लपटों का जंजाल है ||
ले रास्ता इन ठोकरों से ,
भटकना नहीं बढ़ना है तुम्हें आगे ||

माना की व्योम छूते शिखर हैं||
उम्मीदों की रस्सी तितर-बितर है ||
ले होंसला इस ढलान से
झुकना नहीं ,बढ़ना है तुम्हें आगे ||

मुक् ता शर्मा

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About the Author:

सरकारी स्कूल में हिन्दी अध्यापक के पद पर कार्यरत,कालेज के समय से विचारों को संगठित कर प्रस्तुत करने की कोशिश में जुटी हुई , एक तुच्छ सी कवयित्री,हिन्दी भाषा की सेवा मे योगदान देने की कोशिश करती हुई ।

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