अपने लगाए आग में

सुलगती हुयी सी है लगे

उलझनों के दौर में

अभिशाप सी है ज़िन्दगी।

 

मतलब के तलवार पर

है अपनेपन की धार सी

कभी लगती है ये खंजर

मीठी छुरी सी ज़िन्दगी।

 

स्वार्थ में घिरे यहाँ

हैं सभी के चेहरे

मोह के बंधन में जकड़े

बस कैद सी है जिंदगी।

 

सपनों के आगे हार में

अश्कों सी लगती है कभी

दूर तक फैली विरानी में

बंजर सी लगे है ज़िन्दगी।

 

ना कोई उमंग मानो

ना कोई अब रोष है

भाव हुए समभाव में अब

बेरंग सी हुयी ज़िन्दगी।

 

सांसो के आवागमन में

जीवन का एक खेल है

है सभी बस एक मोहरे

रंगमंच सी है जिन्दगी।
 
लेखक / लेखिकाडॉ. वंदना मिश्रा

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