खोज रहीं हैं मेरी आँखें

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खोज रहीं हैं मेरी आँखें

By |2018-03-02T20:53:14+00:00March 2nd, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

तन मन अपने रंग रंग दे।
अधर सुधा रस पिला भंग दे।
वर्षों की इस अतृप्त धरा पर,
नयन नयन से मिटा जंग दे
इस होली पर ऐसा प्रियवर
खोज रही हैं मेरीआँखें।

अंग अंग पुलकित हो जाए।
छटा फागुनी प्रमुदित गाए।
बासन्ती परिधान पहनकर,
मौन तपस्वी जो ललचाए।
इस होली पर ऐसा प्रियवर
खोज रहीं हैं मेरी आँखें।

देख देख उसके यौवन को।
विकसितकुसुमों के उपवन को।
गन्ध अलौकिक लेकर अपनी
महका दे बसुधा आँगन को।
इस होली पर ऐसा प्रियवर
खोज रही हैं मेरी आँखें।

कलि का अलि से अभिनन्दन हो
मस्तक पर रोली चन्दन हो।
रोम रोम जो पुलकित करदे,
उस अभिलाषा का वंदन हो।
इस होली पर ऐसा प्रियवर
खोज रहीं हैं मेरी आँखें।

इस वसुंधरा से अम्बर तक।
हिमचोटी उष्ण समंदर तक।
जिन हाथों का रंग रँग दे ,
ईसा कृष्ण पैगम्बर तक।
इस होली पर ऐसा प्रियवर
खोज रहीं हैं मेरी आँखें।

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About the Author:

डॉ राजीव कुमार पाण्डेय कवि ,लेखक, कथाकार, समीक्षक, हाइकुकार, पत्रकार, मंच संचालक

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