राधा की सुनी आँखों ने ,

फिर से तुम्हे पुकारा है।

हे द्वारिकाधीश सुनो ,

ये गोकुल धाम तुम्हारा है।

 

तुम कान्हा से श्री कृष्ण बने,

बने मथुरा के पालनहार ।

वासुदेव नारायण में,

जैसे खो गये गोविन्द गोपाल।

 

बिन तेरे रैन गुजरे हैं

नयनों में अश्रुवन नीर भरे।

अब भी राह तके हे गिरधारी

मन में धीरज की आस धरे।

 

मंदित पड़ी इस वेणुर में

नव संवत सुर का राग भरो।

सुखी कदंब की डारी में

नव जीवन का संचार करो।

कि यमुना की रक्षा को

फिर मर्दन कालिया नाग करो।

आ जाओं एक बार की ऐसे

संग गोपियों के महारास करो।

लेखक / लेखिकाडॉ. वंदना मिश्रा

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