प्यार की राह

प्यार की राह पर जो मैं चलने लगी,

कभी हँसने तो कभी रोने लगी ।

अनजानी खुशी मन में समाने लगी ,

कभी बिन बात के मैं घबराने लगी ।

 

प्यार की राह पर जो मैं चलने लगी,

अनजानों में  अपनों को ढूँढने लगी।

सिमटी थी, मैं अब बिखरने लगी,

दुनिया की नज़रें भी बदलने लगी।

 

प्यार की राह पर जो मैं चलने लगी,

अपनों की ताक़ीदें अखरने लगी ।

अजनबी के साथ को तरसने लगी,

मानो ज़िन्दगी, रुख बदलने लगी।

 

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Upasana Pandey

परास्नातक,संस्कृत, इ०वि०वि०।(लब्ध -स्वर्णपदक) डी०फिल०, संस्कृत विभाग, इ०वि०वि०।

This Post Has 2 Comments

  1. प्यार की राह में जो मैं चलने लगी……

    सुपर

    मैं बस इतना कहूंगा

    ये मोहब्बत भी बड़े काम की चीज है बड़े नाम की चीज है……

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  2. सुबोध जी , आपकी बातों से पूर्णतः सहमत हूँ। पंक्तियों को पसंद करने व मनोबल बढ़ाने के लिए धन्यवाद।

    Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
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