अंधों का विश्वास

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अंधों का विश्वास

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किसी भी बात को तर्क की कसौटी पर कसे बिना मान लेना यदि अंधविश्वास है तो किसी भी बात की जॉंच-परख किए बिना उसे मानने से इंकार कर देना भी अंधविश्वास ही है ।

मैं यहॉं ज्योतिष विद्या से सम्बन्धित अपने कुछ अनुभव दे रहा हूँ । विचार करें ।

(घटनाओं के पात्र व स्थान आदि के नाम बदल दिए गए हैं ताकि किसी को असुविधा न हो ।)

उस दिन सोमवार था, मैं लुधियाना में था जब मुझे श्रीमती पुष्पा ढेरी का फोन आया ।

“बहुत ज़रूरी काम है । कृप्या, तुरंत परवाणू पहुँचें ।”

श्री सुरेश ढेरी पिछले लगभग डेढ़ साल से मेरे परिचित थे । मैंने काम नहीं पूछा ? यह भी नहीं पूछा कि आपकी समस्या क्या है ? और न ही यह जानने की कोशिश की कि मुझे क्या मिलेगा ? केवल इतना ही कहा कि मैं कालका तक तो बहुत बार गया हूँ, उसके आगे कभी नहीं गया ?

मुझे बताया गया कि बस अड्डे पर आपको लेने के लिए गाड़ी पहुँच जाएगी । आप पहुँचकर फोन कर दीजिएगा । यह तब की बात है जब मोबाइल फोन अभी चलन में नहीं थे ।

अपने सारे काम छोड़कर लगभग दो घंटे में ही मै लुधियाना से वहॉं पहुँच गया ।

मुझे बताया गया कि लगभग पंद्रह दिन पहले श्री ढेरी शाम के समय चण्डीगढ़ से घर लौट रहे थे कि अचानक दोनों आंखों से दिखना बंद हो गया । उत्तर भारत के प्रसिद्ध अस्पतालों में से एक का कहना है कि जब से यह अस्पताल बना है , इस बीमारी का यह चौथा रोगी है । पहले तीन आज तक अंधे हैं, आपके टैस्ट होंगे । जिनकी रिपोर्ट आने में कुछ समय लगेगा । वैसे आपके लिए भी आशा की किरण दिखती नहीं है ।

मैंने अपनी समझ के अनुसार रोग का कारण और उसके निवारण के कुछ उपाय सुझाए । और घर लौट आया ।

पॉंचवें दिन मुझे फोन आया कि बधाई हो ! ऑंखों की रोशनी वापिस लौट आई है ।

छिद्रान्वेषियों के लिए यहॉं दो प्रश्न हैं । पहला : मैंने उन्हें अपने पास से दिया क्या ? और दूसरा : मैंने उनसे लिया क्या ?

* वेदप्रकाश लाम्बा *
०९४६६०-१७३१२

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