शिव की शक्ति

उनकी ही भक्ति

प्रकृति का प्रारूप हूँ मैं,

नारी हूँ मैं !

अन्तस में समेटे हुए

भावनाओं का अथाह समुद्र

स्व-सम्बन्धों को

प्रेम-निर्झरिणी से स्निग्ध

करती हूँ मैं, नारी हूँ मैं !

व्रतोत्सव व समारोहों की

प्राण हूँ मैं, नारी हूँ मैं !

प्रत्येक सामाजिक सम्बन्धों का

आधार हूँ मैं, नारी हूँ मैं !

आधुनिकता की ओर बढ़ती

साथ ही अपनी

सभ्यता व संस्कृति को

सहेजती हूँ मैं, नारी हूँ मैं !

वासना के हृदयाघात से

टूट कर बिखरती परन्तु

वात्सल्य-भाव से स्वयं को

दृढ़ता से खड़ी

करती हूँ मैं, नारी हूँ मैं !

स्वरक्त से सृजित

राष्ट्र के कर्णधारों में

संस्कारों का आरोपण कर

सँवारती हूंँ मैं, नारी हूँ मैं !!!

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2 Comments

  1. गज़ब !!!! अद्भुद !!!

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  2. संजय जी, हौसलाफज़ाई के लिए बहुत- बहुत शुक्रिया

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