“क्या बेटा बेटा लगा रखा है आपने माँ, कोई अबॉरशन नहीं करवाएगी माला”
राघव लगभग चीखते हुये बोला, सब्र जवाब दे गया था उसका।

क्यूँ नहीं करवाएगी, घर में पहले से एक बेटी है, दूसरी नहीं चाहिये मुझे इस घर में” माँ चीखते हुये रो पड़ी।

माँ को रोता देख राघव पास आया और प्यार से बोला” मुझे फर्क नहीं पड़ता बेटियों से। हम उनको भी काबिल बनायेंगे।”

“लेकिन दो बेटियां?” माँ ने बात फिर दोहरायी।
माँ की जिद्द देख कर राघव कुछ सोच कर बोला “ठीक है आपको एक ही बेटी चाहिये तो एक काम करते हैं”

माँ खुश होते हुये बोली “क्या? ”

“हम पहली बेटी को मार देते हैं। फिर तो घर में एक ही रहेगी, ठीक है न माँ” राघव बोला।

ये सुनते ही माँ सन्न रह गयी और बोली” कैसी बात करता है तू, हत्या करेगा अपनी ही फूल सी बच्ची की। जानता है कितना बड़ा पाप है ये।”

“आप भी तो यही चाहती हैं, हत्या उस अजन्मी की जो अभी तक संसार में आयी भी नहीं। पाप तो दोनों ही हैं ,चाहे गर्भ में मारो या बाहर क्या फर्क है” कहा राघव ने।

अब कुछ बात माँ की समझ में आयी और अपनी बहू माला को गले लगाकर कर बोली ” बेटा, बहुत लज्जित हूँ अपनी सोच पर जो हत्या का पाप करने चली थी।”

माला रोने लगी और राघव मुस्कुराते हुये खड़ा सोच रहा था,ये बेटी_बचाओ_बेटी_पढ़ाओ  नारा है या चुनौती।

©कुलदीप कुमार’जॉय’
दिल्ली

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