शुक्रिया ज़िन्दगी . . . . . !

* यादों के झरोखे से *

* * प्रस्तुत कविता / ग़ज़ल ७-३-१९७३ को लिखी गई थी । लेकिन, इसका एक छंद / शेअर आज लिखा गया है ।

ज़रा अनुमान तो लगाइए कि वो छंद / शेअर कौन-सा है । * *

* * * शुक्रिया ज़िन्दगी ! * * *
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यास-ओ-उम्मीद का सिलसिला कुछ इस तरह चला
इक लम्हा हम हंसे इक लम्हा दिल जला

गिराते रहे वो यूं तो तबस्सुम की बिजलियां
वादा भी कर गए मगर आंखें थीं बेवफा

उनके आने की भला सूरत ही कहां थी
तमन्ना थी हो जाए ज़रा आखिरी फैसला

जिसको भी बनाया हमने यार आज तलक
ली मोहब्बत दिया दर्द और बढ़ चला

शिकस्ता-पा उठते नहीं अब किसी तरफ
मंज़िलों से कह दो वीराना घर हो चला

रखिए संभाल कर अब दिल का आईना
सारे जहां में नहीं रहा कोई भी बा-वफ़ा

शुक्रिया ज़िन्दगी ! बे-ऐब न थे हम
हर क़तरा रौशनी का रहमत से तेरी मिला

२७-२-२०१७ -वेदप्रकाश लाम्बा
०९४६६०-१७३१२

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This Post Has 2 Comments

  1. बहुत सही बात कह दी 1 नम्बर

    जिसको भी बनाया हमने यार आज तलक
    ली मोहब्बत दिया दर्द और बढ़ चला

    सर अर्ज है

    जो कहते थे फ़क़त जमाने से हम तेरे हैं
    उन्हें याद करने की फुरसत नही

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  2. बहुत सुन्दर !!!!!

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