मशहूर हैं जहाँ में . . . . .

* मैंने ऐसा बहुत कुछ लिखा है जिसे गाया जा सके, गुनगुनाया जा सके । वो कविता है या नज़्म, गीत है या गज़ल यह तो विद्वान लोग ही जानते हैं ।

प्रस्तुत रचना ४-३-१९७३ को लिखी गई थी ।

* * * मशहूर हैं जहां में * * *
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उठा है शौके – परस्तिश वो ज़रा बाखबर रहें
लाइलाज है जुनूं ये मुतमईन चारागर रहें

किब्ला – ओ – काबा – ए इश्क कितना हो पुरख़्तर
संवारेंगे ज़ुल्फ उनकी ये उनसे जा कहें

मशरिक से उरूज़ होगा हर सूरत में आफ़ताब
चंद टुकड़े ये बादलों के कुछ भी किया करें

मिट जाएंगी कट जाएंगी कुल साज़िशे – ज़माना
कुव्वते – हुस्नो – इश्क अगर मिल कर अहद करें

हम हैं मता – ए – आख़िरे – अफ़साना – ए – ज़िंदगानी
मशहूर हैं जहां में चाहे जिधर चाहें

२२-२-२०१७ –वेदप्रकाश लाम्बा
०९४६६०-१७३१२

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