पाखंड का पथ

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पाखंड का पथ

। । *ओ३म्* । ।

* * * पाखण्ड का पथ * * *

मैं यहाँ तीन घटनाओं की बात करूंगा । तीनों घटनाएँ २००३ की हैं । हाँ, पात्रों व स्थानादि के नाम कुछ बदल दिए हैं ।

( एक )

बड़े भाई सोमप्रकाश सैनी, भाजपा के नगराध्यक्ष, मँझले नरेन्द्र सैनी, नगरपालिका अध्यक्ष, तीसरे लायन्स क्लब के अध्यक्ष; मुझे मँझले भाई का फोन आया कि “कल राज्यपाल महोदय के साथ बैठक में बचपन के मित्र मिल गए । घर-परिवार की कुशल-मंगल पूछने पर मैंने अपनी माता जी की समस्या बताई तो उन्होंने आपका फोन नंबर दिया ।”

मैंने कहा कि “किसी भी साधन से आयु नहीं बढ़ाई जा सकती । हाँ, कष्ट कम करने का प्रयास किया जा सकता है ।”

पाँचवें दिन उनकी पत्नी का फोन आया कि “अब माता जी अपने-आप उठकर बैठ जाती हैं । अपने हाथों से खाना भी खाने लगी हैं ।”

मेरा स्पष्ट कहना था कि “दिया जब बुझने पर आता है तो अपनी पूरी ताकत से जलता है ।”

तीसरे दिन मुझे फोन आ गया कि माता जी नहीं रहीं ।

थोड़े समय के बाद फिर उन्हीं महोदय का फोन आया कि “कल बड़े भाई का हार्ट का वाल्व बदलवाना है , आप्रेशन है, कुछ बता दीजिये ।”

मैंने कहा कि “यह कोई जादू का खेल नहीं है कि मैं कुछ बता दूँ तो आप्रेशन ठीक हो जाएगा । मुझे कुछ दिन तो दो ।”

“डाक्टर का कहना है कि अगर आपने देरी की तो दूसरा वाल्व भी बदलना पड़ सकता है । और , एक वाल्व की कीमत पचास हज़ार रुपए है ।”

“आप ज्योतिषीय उपाय करने के बाद जाएं तो संभव है कि एक भी वाल्व न बदलना पड़े “, मैंने कहा ।

उस दिन गुरुवार था ।

सोमवार दोपहर के समय मुझे फोन आया कि “आपका भी धन्यवाद और जिन्होंने आपका फोन नंबर दिया उनका भी धन्यवाद । हम भाई साहब को अस्पताल से वापिस घर लेकर जा रहे हैं । डाक्टर का कहना है कि इनके दोनों वाल्व ठीक हैं ।”

प्रश्न यह है कि उस धन्यवाद को मैं ओढ़ूँ या बिछाऊँ, चबाऊँ या पी जाऊँ । यहीं से प्रारम्भ होता है पाखण्ड का पथ ।

-वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

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