। । ओ३म् । ।

* * * पाखण्ड का पथ * * *

( दो )

होटल पुखराज के मालिक के साथ आए व्यक्ति ने बताया कि दो महीने बाद होटल को बने तीन वर्ष हो जाएंगे ; और इन तीन वर्षों में प्रति माह औसतन तीन लाख की हानि हो रही है ?

होटल के मालिक सुनील चन्द्रा जी ने बताया कि हमारे समधी सेठ आलोक दिल्ली से वास्तु-विशेषज्ञ को लाए थे, उसका कहना था कि होटल का वास्तुदोष निवारण के लिए होटल का मुख्य द्वार सौ फुट चौड़ी सड़क की ओर से बंद कर दीजिये, और, साथ लगती बीस फुट चौड़ी गली में खोल दीजिये ।

सुनील चन्द्रा जी ने यह भी बताया कि उन वास्तु-विशेषज्ञ की फीस इक्कीस हज़ार रुपए दी थी उन्होंने ?

श्रीमान सुनील चन्द्रा जी ने यह भी बताया कि ज़िला के डिप्टी कमिश्नर महोदय भी एक वास्तु-विशेषज्ञ को लाए थे, उन महाशय का कहना था कि “होटल की रसोई दाएं हाथ से तोड़कर बाएं हाथ बनाएं ।” तीन सितारा होटल की रसोई तोड़कर फिर से बनाने में लाखों का खर्चा और महीनों होटल बंद रखना पड़ेगा ।

वे बोले, अब आप भी वास्तु-दोष बता रहे हैं ? इसका समाधान बताइए ?

मैंने कहा कि बाज़ार से ‘ यह ‘ वस्तु लाइए और होटल में फलाँ जगह रख दीजिएगा ।

होटल का जो कर्मचारी  मेरी बताई हुई वस्तु लेकर आया उसने मुझे बताया कि  “अंकल जी,  दो सौ अस्सी रुपए लगे ।”

उस दिन के बाद से होटल की कमाई दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ने लगी । आज शहर में कई नए होटल खुल चुके हैं परंतु, होटल पुखराज की कमाई आज सबसे अधिक है ।

आज इस घटना को चौदह वर्ष बीत चुके हैं । कुछ साल तक सुनील चन्द्रा जी अपना वर्षफल बनवाने आया करते थे । मैंने ही कहा कि “यह काम तो कम्प्यूटर ऑपरेटर भी कर सकता है, कोई विशेष काम हो तो बताइएगा ।”

इतने वर्षों में एक भी व्यक्ति नहीं आया मेरे पास जिसने यह कहा हो कि “आपका पता मुझे सुनील चन्द्रा जी ने दिया है ।”

वो इक्कीस हज़ार फीस लेने वाला अथवा डिप्टी कमिश्नर महोदय का अपना पुरोहित ही लाभ में रहे । ऐसे में जब ईमानदारी से रोटी न मिले तो पाखण्ड का पथ किसे नहीं लुभाता ?

ऊपर वर्णित घटना के पात्रों व स्थानादि के नाम बदल दिए हैं ताकि किसी को असुविधा न हो ।

-वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

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