सपूतों को आह्वान  

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सपूतों को आह्वान  

 

जाग – जाग देश के सपूत! जाग तू एक बार रे |

आज दहेज के दैत्य ने मचा रखा हाहाकार रे ||

 

विधाता के बगिया की कोमल कली,

बाबुल के स्नेह उर्वर से पली,

चढ़ रहे नित दहेज की बलि,

अग्नि – वीणा से भर तू क्रान्ति का झंकार रे |

आज दहेज के दैत्य ने मचा रखा हाहाकार रे ||

 

ए अग्निपुत्र  जाग – जाग,

छेड़ दे प्रलय का राग,

लग जाए चहुँ ओर आग,

जल उठे दहेज के दस्तूर हो जाए छार-छार  रे |

आज दहेज के दैत्य ने मचा रखा हाहाकार रे ||

 

ए गगन !बरसा आज अग्निकण,

दिशाएँ दहकती रहे प्रतिक्षण,

प्रलय के देवता का हो तांडव – नर्तन,

हो धरा के वक्ष पर अंगार ही अंगार रे |

आज दहेज के दैत्य ने मचा रखा हाहाकार रे ||

 

हो नारियां मुक्त दहेज के पीड़ से,

हो मुक्त उनके नयन छलकते नीर से,

न बिंधे उनके उर उलाहना के तीर से,

न पड़े सहना किसी को दहेज के विषम प्रहार रे|

आज  दहेज़-दैत्य ने मचा रखा हाहाकार रे ||

 

सत्तावन की क्रांति में तुम,

गाँधी के शांति   में  तुम,

सुभाष की क्षान्ति में तुम,

तू ही समग्र क्रांति का नव-सूत्रधार रे !

आज दहेज के दैत्य ने मचा रखा हाहाकार रे ||

जाग – जाग देश के सपूत! जाग तू एक बार रे |

आज दहेज के दैत्य ने मचा रखा हाहाकार रे ||

-सुबल चन्द्र राय  ‘सुधाकर’

 

 

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