बता कोकिले :- (भाग – 1)

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बता कोकिले :- (भाग – 1)

By |2018-03-25T20:50:11+00:00March 10th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

 

पंक्तियाँ  पाक्षि-कोकिला को समर्पित  जिनके  माध्यम से मानव के धन लोलुपता पर कलात्मक ढंग से आघात करने का  प्रयत्न  कर रहा हूं|

-: बता कोकिले :-

बता कोकिले! आज बता तू ,

तेरा यह कूजन है गान ?

या फिर तेरी हृत तंत्री की,

है यह वेदना भरी तान ?

माना कि कुहू – कुहू के स्वर से,

तुम गाती रहती हो सर्वदा,

पर, वह कोन सा सुर है जिससे,

तुम रोती होगी यदा – कदा ?

या तुम रोती ही ना कभी, हँसती ही रहती हो हर क्षण ,

तेरे हास्य जीवन में, क्या नहीं तनिक भी है रुदन?

माना कि तेरे नभ पथ पर,

किरणों के खिलते रहते हैं फूल |

पर, डालियों – टहनियों पर क्या,

नहीं चुभते तुम्हें शूल?

रहते रहे हैं द्वारे तेरे,

क्या सारे भोग करबद्ध खड़े?

तुझको क्या नहीं जीवन में,

दाना – पानी के फेर पड़े?

गैरों की तो सह लेती होगी, कटुता भरी तुम तीक्ष्ण तीर,  

पर, अपनों के विष – बुझे वाण से, होती क्या तुम नहीं अधीर?

निष्ठुर पवन के कराघात से,

जाते हैं बिखर जब तेरे आगार|

तब भी कैसे पाती हो निकाल,

कंठ से गीतों की मधुमय धार|

नित ही महोत्सव मनता है क्या,

तरु के तेरे ऊँचे महल में?

जलता तेरा तन नहीं कभी क्या,

प्रिय विरह के धधकते अनल में ?

ऐ अग्नि की  गायिके ! बता दे, मुझको तू जीने की कला |  

 अपरिग्रह निरत्त भी रहकर तुम, कैसे गुजारती हो दिनों को भला ?

 सुख – दुःख मिलन – विरह में तुम,

कैसे बरत पाती हो समभाव?

गायिकी की समय- सारिणी में तेरी,

होती क्यों न तनिक बदलाव?

दाध-दग्ध धरा को तुम,

दिया करती हो मधुमय उपहार।

प्रतिदान में मांगा भी कभी क्या,

जग से तनिक प्यार दुलार?

तुम क्यों मांगने लगी हो भला, तुम्हें है लालसा सिर्फ लुटाने की।  

संचय- वृत्ति नहीं है तुम्हारी, चाह नहीं है पाने की॥

-सुबल चन्द्र राय ‘सुधाकर’

 

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