कितनी प्यारी सुबह की बेला आई

हुई चिड़ियों कि चहक,आई फूलों की महक,

भौंरों का गुनगुनाना, हवाओं का बलखाना

इठलाती इन हवाओं का संदेशा तराना लगे है

तेरे आने का अंदेशा

मचलती मदहोश इन हवाओं की चुभन

मेरे तन बदन को झकोरे है

सुनहरी किरनें ठंडी ओस को जो छूने लगी

भीनी सी खुशबू बहे जो हवा के संग

मेरे अंतरमन में तुम समाहित होने लगे हो

ख़यालों में तेरी यादों का तूफान मचलने लगा

काश आ जाये आप जो सामने

इन प्यासी निगाहों में मैं छुपा लें तुम्हेें

मचलता दिल ये कहने लगा है

दिन जो बढ़ता गया यादों का सिलसिला बदलता गया

मेरा मन लाखों सवालात करे है

दिल मेंं प्यास है तेरे आने की आस है

अब तो फैली दोपहर की आग है

संग यादों की बारात है

चारों तरफ तो तपन है दिल में तड़प है

शाम होने को जो आई है

दिल की धड़कन में तेजी लाई है

मन न माने है कि प्रिये तू न आई

कैसी है रात्रि की बेला “साथिया” तेरी यादों ने घेरा

मोहब्बत की ये कैसी अजब कसमकस है

बिना तुझको देखे न दिल को पल भर को सबर है

जहन में बसी है जो सूरत तेरी

हर इबादत की वो मूरत बनी

बिना तेरे दिल न लगे, हाँ दिल न लगे

ओ साथिया आ जा….ओ…अब आ… भी जा….कि

“साथिया यही कहना कि दिल न लगे”है

दिल न लगे मेरा ओ…तेरे बिना साथिया

“साथिया यही कहना कि दिल न लगे”

 

सुबोध उर्फ सुभाष

11.3.2018

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