लौट आई मुस्कान

बात वर्ष १९९२ -१९९३ की है | मैं १०-११ वर्षों से घर से दूर रह रही थी | कब हफ्ता, महीना और साल बीत जाता पता ही नहीं चलता |

हमारे संयुक्त परिवार में सास-ससुर के साथ छोटी ननद औत नटखट देवर भी था |बच्चों से जुदाई सबके लिए असहनीय होती है | सासू माँ बेटे से दूर रहने के कारण उनकी तरक्की से भी खुश नहीं रहती थीं | वे चाहती थीं कि बेटा उनके पास ही रहे | वे अक्सर कहती थीं कि जो कुछ भी करना है बनारस में ही रहकर करो | कई बार वह इतना भावुक हो जातीं की उदहरण देकर कहतीं कि तुम्हारे साथ जो खन्ना अंकल का बेटा पढ़ता था, अब वह यहीं रीडर हो गया है | तुम कोशिश करो और यहीं लैक्चरर हो जाओ | उनकी आंखों में मैं हमेशा बेटे से दूर रहने का दर्द देखती थी | मगर इन पर कोई फर्क नहीं पड़ता था |

एक दिन बातों-बातों में ये मुझे बता गए कि पढाई खत्म करने के तुरंत बाद इन्हें लैक्चररशिप का ऑफर था | मैंने मायूसी से कहा कि मैनेजमेंट का चयन किया और लैक्चररशिप क्यों छोड़ी आपने ? इन्होंने बताया कि इन्हें टीचिंग पसंद नहीं है | मगर मेरे बार-बार कहने पर ये टीचिंग कि जॉब करने के लिए राजी हो गए | सुखद था कि उसी दौरान बनारस के विश्वविधालय में डिप्टी रजिस्ट्रार की पोस्ट का विज्ञापन निकला | पति ने भी फार्म भरा और चयनित हो गए |

मेरी प्रसन्नता की सीमा न थी लेकिन पति के लिए यह विचारणीय विषय था | बिना सोचे समझे कोई कदम उठाना इनके स्वभाव में नहीं है | मैंने जॉब ज्वाइन करने के लिए कहा तो बोले कि वहां मेरा करियर ब्लॉक हो जायेगा | आगे प्रमोशन की भी संभावना नहीं है | मेरे बार-बार समझाने पर वह बोले कि इतने सालों से मेरे साथ अकेले रहने के बाद अब सयुंक्त परिवार में तालमेल बिठा पाओगी ?

इसका उत्तर मेरे लिए कठिन था लेकिन मैंने विश्वाश दिलाते हुए कहा कि जहाँ आप रहेंगे, वहां मुझे रहने में कोई परेशानी नहीं होगी | ये समझाते हुए कहने लगे कि तुम खुली हवा में सांस लेने की आदी हो चुकी हो | संयुक्त परिवार में रहना आसान नहीं है | जो ऐसे परिवेश में ढला हो, उसके लिए यह कठिन है | बड़ों कको सम्मान देना होगा और उनकी उम्मीदों पर खरा भी उतरना होगा | मेरे भाई-बहन छोटे हैं तो उनकी गलतियों को भूल कर दिल से  माफ़ भी करना होगा |

पति ने घर वापसी का निर्णय मुझ पार छोड़ दिया और मैं इन्हें साथ लेकर घर लौट गई | हम लोग संयुक्त परिवार में ख़ुशी-ख़ुशी रहने लगे | बेटे के साथ रहने पर माँ के चेहरे पर भी मुस्कान लौट आई | पूरा परिवार खुश हो गया | सालों पहले कि यह घटना मुझे आज भी ताज़ी लगती है और मैं यही सोचती हूँ कि खुशहाल जिंदगी के लिए खुद में परिवर्तन करना भी बेहद जरुरी है |

लेखक – शशि उपाध्याय

साभार – दैनिक जागरण

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