पाखंड का पथ ( तीन )

Home » पाखंड का पथ ( तीन )

पाखंड का पथ ( तीन )

। । ओ३म् । ।

* * * पाखण्ड का पथ * * *

( तीन )

अमेरिका के डेवनपोर्ट शहर से आया था संधू परिवार । वे आए तो थे अपने दो बेटों के लिए बहुएँ तलाशने , परंतु, उनके परिवार के ही एक सदस्य ने उनकी व्यथा – कथा सुनी तो वो उन्हें मेरे पास ले आया ।

उन्होंने बताया कि “शहर के बीच में उनका एक पम्प – स्टेशन (पेट्रोल पम्प) है । जहाँ कि तीन पम्प हैं । काम ठीक चल रहा था कि शहर के बाहर मुख्य राजमार्ग पर एक बड़ा पेट्रोल पम्प बहुत ही कम दामों में मिल गया । इसके लिए बैंक से लिए कर्ज़ की की किश्त दो हज़ार महीना है और पम्प के भीतर ही एक दुकान बारह सौ महीना किराए पर दे दी हमने । पम्प स्टेशन में कुल पाँच पम्प हैं ।”

“कुछ दिन तो काम ठीक चला । मगर बाद में धीरे – धीरे यह हाल हो गया कि आठ सौ डॉलर महीना भी जेब से देने पड़ते हैं । बीच – बीच में अजीब तरीके से कुछ नुक्सान भी हो जाते हैं ।”

“जैसे कि अभी कुछ दिन पहले तेल में पानी की शिकायत आ गई । आसपास कहीं भी पानी का पाईप नहीं, नाली नहीं, फिर भी पानी ? जो जुर्माना भरना पड़ा वो तो भरा ही, जो बदनामी हुई वो अलग से ।”

मैंने गणना की और उन्हें बताया कि “मेरी समझ के अनुसार वहाँ पर किसी व्यक्ति की आत्मा भटक रही है ।”

उन्होंने मेरी बात का अनुमोदन करते हुए बताया कि “जब उनका काम वहाँ लगभग ठप्प हो गया तो आसपास के लोगों से पता चला कि कुछ समय पहले यहाँ से थोड़ी दूरी पर दो गुटों में भिड़ंत हो गई । गोलीबारी में घायल एक व्यक्ति गिरता – पड़ता यहाँ तक पहुँचकर मर गया ।”

“इसके बाद उस पम्प का काम धीरे – धीरे समाप्त हो गया । तभी हमें यह इतने कम दामों में मिल गया ।”

मैं कभी अमेरिका नहीं गया ।

यह बात फरवरी , दो हज़ार तीन की है । सितम्बर, दो हज़ार तीन में यहाँ कई समाचारपत्रों में एक समाचार सचित्र प्रकाशित हुआ था कि अमेरिका के डेवनपोर्ट शहर में समंदर का पानी घुस गया । साथ में दिए चित्र में एक बड़े-से टोकरे में कुछ सामान रखा हुआ था, जिसमें विशेष रूप से एक महिला की प्लास्टिक की बनी हुई टाँग दिखाई दे रही थी । और वो टोकरा डेवनपोर्ट शहर की गलियों के बीच पानी में तैर रहा था ।

संधू परिवार का संदेश मिला कि शहर के सारे पम्पों में पानी घुस गया परंतु, उनका पम्प पूरी तरह सुरक्षित रहा ।

अब प्रश्न यह है कि मुझे क्या मिला ?

मैंने अपने पाँच दशकों के अनुभव में से केवल तीन घटनाएँ यहाँ दी हैं । अच्छे लोग भी मिले । लेकिन, पाखण्ड का आज बोलबाला है । लाल किताब के नाम से जितना पाखण्ड हो रहा है, जितनी लूट हो रही है , उसका अनुमान लगाने भर से मन घृणा से भर उठता है । लेकिन, उसके लिए दोषी कौन है ?

विचार करें ।

ईश्वर आपका भला करे !

-वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

Say something
Rating: 4.5/5. From 2 votes. Show votes.
Please wait...

Leave A Comment