शोक दिवस

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शोक दिवस

। । ॐ । ।

~शोक दिवस ~
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आज ही के दिन श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर को विवादित ढांचा कहकर धराशायी कर दिया गया था ।

बाहर-भीतर नंगी आंखों दिखने वाले अनगिनत सबूतों को मिटा दिया गया । वे सबूत ढोल-नगाड़े की तरह चिल्ला-चिल्ला कर उद्घोषणा कर रहे थे कि हम श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर के पवित्र अंग हैं ।

पिछले तेईस वर्षों में जो समझ न सके अथवा समझना नहीं चाहते अथवा जिनकी समझने की समझ ही कुंठित है वो सब के सब समझ लें कि जो लोग श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर को बाबरी मस्जिद बता कर उसे टूटने से बचाना चाह रहे थे और जो लोग पवित्र मन्दिर को विवादित ढांचा बता कर उसे तोड़ना चाह रहे थे, दोनों की नज़र एक ही लक्ष्य पर टिकी थी — और वो लक्ष्य था — वोट ! एक पक्ष को मुस्लिमों के वोट चाहिए थे दूसरे को हिन्दुओं के । इस पापकर्म में दूसरा पक्ष अधिक दोषी है ।

जिनकी रीढ़ की हड्डी दुहरी हो चुकी है, जो घुटनों के बल झुकते-झुकते रिरिया रहे हैं, भिखारियों की तरह, “हमें हमारे तीन स्थान (अयोध्या, काशी, मथुरा) दे दो, हम तीन हज़ार पर अधिकार छोड़ देंगे ।” उन्हें यह कहने का अधिकार किसने दिया ? मैंने तो नहीं दिया । क्या आप ने दिया ?

एक हज़ार दो सौ पैंतीस साल की गुलामी के बाद मिली आज़ादी के बाद क्या हम सचमुच आज़ाद हैं ? क्या गुलामी से पहले की स्थिति लौट आई है ?

हमारी सामाजिक प्रणाली वो पहले-सी स्वदेशी नहीं है ! हमारी शिक्षा प्रणाली विदेशी है ! हमारी चिकित्सा प्रणाली स्वदेशी नहीं है ! बात यह है कि जीवन के हर क्षेत्र में हमारा आचरण हमारा अपना नहीं रहा !

कुछ लोग हमारे जीवन-दर्शन को बीता हुआ, पिछड़ा और गंवारू कहते हैं । हमारे इतिहास को संपेरों-मदारियों का इतिहास कहते हैं । कभी हमारा देश सोने की चिड़िया कहलाता था, इस बात को जो झूठ बताते हैं; उनसे सीधा प्रश्न है कि यदि हमारे देश में कुछ भी नहीं था तो एक-से-एक आततायी, चोर-डाकू, लुटेरे यहां घास खोदने आते थे क्या ?

जहां तक बात मंदिर की है, यह जान लीजिए कि इस देश में रहने वाला हर मुस्लिम भारतीय है, मगर इस्लाम भारतीय नहीं है ।

बाबर के बारे में श्री गुरु नानकदेव जी महाराज से अधिक स्पष्ट बात कोई कह नहीं पाया । उन्होंने आंखों देखा वर्णन किया है कि “ज़ालिम पाप की बारात लेकर काबुल से आया है । उसके ज़ुल्म देखकर लगता है सत्य और धर्म कहीं छुप गए हैं । हे मेरे ईश्वर ! जनता बिलख रही है और तुझे दया नहीं आती ! ?”

ऐसे नरपिशाच के नाम से धर्मस्थान ? यदि हो भी तो उसे तोड़ देना ही चाहिए । परन्तु, मेरे – आपके – सबके राम का मन्दिर विवादित ढांचा कहकर तोड़ देना ! हे राम ! यह बाबरी कृत्य करते हुए दिल न कांपा सौदागरों का ! ‘वोट’ के सौदागरों का !

आज ‘शोक दिवस’ है !

मेरे राम ! उन्हें क्षमा करना !

— वेदप्रकाश लाम्बा

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