माता-पिता की बेटी,

भाई की बहना,

पति की धर्म-पत्नी,

ससुराल का गहना,

सन्तान की माँ बनकर

सारे सम्बन्धों को निभाती ,

इनमें ही मैं बँधती जाती ।

सम्बन्धों में ढूँढती अस्तित्व,

चाहती हूँ अपना व्यक्तित्व ।

अपने हुनर को दिलाकर पहचान,

समाज में बनाना चाहती हूँ स्थान।

नहीं बनना मात्र, नींव का पत्थर,

बन पताका, ऊपर उठकर

जीवन में भरने को ऊँची उड़ान,

चाहिए मुझे थोड़ा -सा आसमान ।

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