संतुष्टि का भाव

एक दिन अचानक मैं खुशी से भर गई | दरअसल,मुझे पता चला था कि मेरा नाम लिखित परीक्षा के अधर पर एसआई पद के शार्टलिस्ट हो गया है | अब इंटरव्यू की बारी  है | मुझे अपने सरे सर्टिफिकेट के साथ समय पर आयोग पहुंचना होगा | मैंने जैसे ही यह खबर घर में सुनाई सभी सदस्यों के चेहरे खिल उठे | इंटरव्यू वाले दिन मैं सुबह- सुबह घर से निकलकर स्टेशन पहुंची | कुछ देर बाद ट्रेन आई | भीड़ अधिक होने के चलते जैसे-तैसे मैं और पापा सीट पाने में कामयाब हुए |

रेलयात्रा के दौरान जहरखुरानी की घटनाएँ अधिक होती हैं, इस डर से सफर में हम लोगों ने कुछ भी नहीं खाया था | जब हम निजामुद्दीन स्टेशन पर पहुँचे तो पापा ने दुकान से केले लिए और साथ ही चिप्स व पानी खरीदा | हम वहीं पास कि बेंच पर बैठकर भूख मिटाने लगे | तभी वहां एक गरीब बच्ची आई जिसके शरीर पर कपड़े के नाम पर पतली सी फ्रॉक थी और गोद में लगभग दो साल का बच्चा भी था | शायद उसकी उम्र ६-७ वर्ष रही होगी | वह तरसती आँखों से मेरी तरफ देखने लगी | मैंने अपने हाथ में बचे दो केले देने के लिए जैसे ही हाथ बढ़ाया, पापा यह खाकर डाटने लगे कि अभी तो भूख के कारण तुम बहुत व्याकुल थी | ये लोग तो जहाँ देखो वहां मिल जाते हैं | मैंने भी मन मारकर बचे केले खाने आरम्भ कर दिए |

वो लड़की बार-बार मेरे आगे हाथ फैला रही थी | तभी किसी चमत्कार जैसी घटना हुई | एक केला खाते समय जमीन पर गिर गया और दूसरा केला खराब निकला | मुझे तुरंत अपनी गलती का अहसास हुआ और उसे सुधारने के लिए मैंने आगे बढ़ चुकी लड़की के लिए एक दर्जन केले लिए और उसे पकड़ा दिए | उसको जल्दी-जल्दी केले खाते हुए देख यह गलानि हुई कि मैं किसी और के भाग्य में लिखा दाना खा रही थी | इसी कारण वह मुझे भी नहीं मिला | भूख मिट जाने के बाद जो खुशी मैंने उसके चेहरे पर देखी तो आत्मा को बड़ा संतोष मिला | उस दिन मैंने यह सुनिश्चित किया कि आगे से किसी जरुरतमंद की मदद बिना किसी संकोच के अवश्य करुँगी |

लेखक – सोनल सिंह गौतम

साभार :- दैनिक जागरण

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