जब समक्षा मैंने इस ढाई अक्षर की गहराई को,
तब जाना मैंने इस जीवन की सच्चाई को।

शब्दों से ही रिस्ते हैं
और शब्दों से ही मित्र यहाँ
और दुश्मन भी कोई है तो है
शब्दों के तीर जहाँ ।

गर शब्द तुम्हारे अच्छे हैं तो
सब तुमको अपनाएंगे,
गर शब्दों से तुम भटक गये
तो सब तुमसे दूरी बनाएंगे ।

कुछ शब्दों के ही कारण तो
एक धर्मयुद्ध था शुरू हुआ,
और धर्मयुद्ध मे कान्हा ने भी
शब्दों में हि कही गीता ।

यहाँ शब्दों के इस सागर मे
एक शब्द मंत्र हो जाता है,
शब्दों के इस सागर में ही
एक शब्द स्नेह झलकता है,
एक शब्द प्रेम बढ़ाता है,
एक शब्द शत्रु बनाता है ।

तो शब्दों के इस सागर से
अच्छे मोती चुनना सीखो,
धीरे-धीरे बुनना सीखो,
धीरे-धीरे कहना सीखो ।।

…….निधी चंदेल…..

Say something
Rating: 3.8/5. From 11 votes. Show votes.
Please wait...