ज़िदगी की शोर में

गुम मासूमियत

बहुत ढ़ूँढ़ा पर

गलियों, मैदानों में

नज़र नहीं आयी,

अल्हड़ अदाएँ,

खिलखिलाती हंसी

जाने किस मोड़ पे

हाथ छोड़ गयी,

शरारतें वो बदमाशियाँ

जाने कहाँ मुँह मोड़ गयी,

सतरंगी ख्वाब आँखों के,

आईने की परछाईयाँ,

अज़नबी सी हो गयी,

जो खुशबू बिखेरते थे,

उड़ते तितलियों के परों पे,

सारा जहां पा जाते थे,

नन्हें नन्हें सपने,

जो रोते रोते मुस्कुराते थे,

बंद कमरों के ऊँची

चारदीवारी में कैद,

हसरतों और आशाओं का

बोझा लादे हुए,

बस भागे जा रहे है,

अंधाधुंध, सरपट

ज़िदगी की दौड़ में

शामिल होती मासूमियत,

सबको आसमां छूने की

जल्दबाजी है।

          -श्वेता सिन्हा

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