दोहे

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दोहे

इस कल युग के काल में, मचा हुआ हुडदंग।

डर-डर के जीते फिरें, सूख चुके सब अंग।।१

नर डर-डर के जूझता, लेकर स्वयं उपाधि।
बेकारी ऐसी हो गई,  जैसे बनी समाधि।।२
नर धीरे-धीरे मरा, मरी शर्म न लाज।
मरते-मरते भी कहा, बच गए मेरे काज।।३
सूरज ऊपर जा चढ़ा, छोड़ी इसने धूप।
बाला मुख ढक चली, बिगड़ न जाए रूप।।४
दो पल के संसार में, कैसी है तकरार।
रिश्ते नाते मर गए, झूठमूठ का प्यार।।५
शासन ने  सब कुछ किया, लिया दिया न कोई।
घुट-घुट के अब सब मरे,  क्या करेगा कोई।।६
कुर्सी पर बैठा हुआ, काम करे न कोई।
काम जब भी पड़ गया, हालत गड़बड़ होई।।७
चौबीस घण्टों काम है, दिन भर न आराम।
लक्ष्मी फ़िर भी दूर है, करते-करते काम।।८
बेरोजगारी से मर रहा , सारा सकल समाज।
बैठे-बैठे जुग हुआ, पर मिला न गत काज।।९
स्वप्न यों जो देखते, राम राज्य  का देश।
भूखे प्यासे मर रहे, भ्रष्टाचार का देश।।१०
दिन भर करते काम है , फिर भी है बदनाम।
ईमानदार की जिंदगी, गरीबी के हालत।।११
                                           -सर्वेश कुमार मारूत
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सर्वेश कुमार मारुत पिता- रामेश्वर दयाल पता- ग्राम व पोस्ट- अंगदपुर खमरिया थाना- भुता तहसील- फरीदपुर बरेली 243503

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