संग्राम

आज गुम शुम सा है हर कोइ
खाली पड़ा है अखबार
या खत्म हो गया संसार
आज गुम शुम सा है हर कोइ
चोर, भ्रषट् ,छल , कपट
सब चौंकन्ने कि कहीं सबकी
नजर मुझे खत्म करने पर तो नहीं
आज गुम शुम सा है हर कोइ
शायद एक बड़ी क्रांति
जो कभी नहीं हुइ हो
सबके अंदर से उठी थी एक विश्वास,
जो पराकाष्ठा पर पहुंची थी कि
“सर्वजन हिताय,सर्वजन सुखाय “|||
– कृष्ण कुमार भारती

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