तुम क्यों गए परदेस ?

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तुम क्यों गए परदेस ?

तुम क्यों  गए परदेस ?

वतन से इतनी दूर जहाँ,

पहुँच सके ना कोई चिठ्ठी ,ना सन्देश.

चलो ! मिल भी जाये गर सन्देश ,

तो भाई ! अपना देश तो होता है अपना देश .

अपने घर की तो  सुखी रोटी ही भली,

परदेश की सोना उगलने वाली धरती से ,

अपने स्वदेश की  सादी मिटटी ही भली .

जाने क्यों तुम छले गए  किसके हाथों?

या यूँ समझो ! तुम छले गए तकदीर के हाथों.

छलावा  मनपसंद ,मोटी तनख्वाह वाली नौकरी का,

छलावा  बढ़िया जीवन -शैली   जीने का .

इस सुनहरे  ख्वाब  की रुपहली डोर से ,

बांध दिए गए  तुम और तुम्हारे  अपने .

यक़ीनन ! मुफलिसी /मज़बूरी के हाथों ,

छलावे  में  छले  गए  तुम और  तुम्हारे  अपनों  के सपने.

फिर भी  दिल पर पत्थर  रखकर  तुम्हारे  परिवार ने ,

तुम्हें   विदा किया .

जल्दी  लौटकर  आने  का तुमसे  उन्होंने ,

वायदा भी लिया.

मगर हाय ! यह क्या सितम हुआ !

बेताब थे  कितने समय से सुनने को ,

तुम्हारी सलामती की खबर .

परन्तु  सुनने को मिली तुम्हारी मौत की खबर .

ज़ालिम  दहशतगर्दों  के  नापाक  हाथों जो  ये  ज़ुल्म हुआ.

बड़ी बेदर्दी  से  मानवता  का  खून हुआ .

इंतज़ार  कर रहे जो मेहंदी वाले  हाथ,

वोह नन्हे -नन्हे  कोमल  हाथ ,

और   उम्र की  सांध्य बेला से थके बूढ़े हाथ,

तुम्हारा और तुम्हारे साथ आई खुशियों की सौगात का .

उनके  अरमानो पर,  उनके  जीवन  पर ,उनकी  भावनाओं पर ,

हाय  !   काल का कठोर  प्रहार हुआ.

आंसुयों  के सैलाब  में  डूब गया  तुम्हारा  घर-आँगन .

जब तुम नहीं ! तुम्हारा  क्षत -विक्षत शव आया ,

लपेटकर  कफ़न .

इतना दर्द ,पीड़ा,  संताप,  दुःख छोड़  गए तुम  अपने ,

रोते -बिलखते  परिवार के लिए.

के  अब बस आह !  ही रहेगी  उनकी जुबान पर  उम्र भर के लिए.

और एक  शिकवा ”  तुम  क्यों  गए परदेस ” ?

परदेस से भी  आगे  तुम भेज दिए गए  उस  देश,

जहाँ  नहीं  पहुँच  सकती  कोई चिठ्ठी ,न सन्देश .”

काश ! तुम ना जाते  परदेस !!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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संक्षिप्त परिचय नाम -- सौ .ओनिका सेतिया "अनु' , शिक्षा -- स्नातकोत्तर विधा -- ग़ज़ल, कविता, मुक्तक , शेर , लघु-कथा , कहानी , भजन, गीत , लेख , परिचर्चा , आदि।

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