समुन्द्र की पराजय

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समुन्द्र की पराजय

By |2018-01-20T17:07:35+00:00January 13th, 2016|Categories: पंचतन्त्र|0 Comments

 

समुन्द्र के तट पर एक स्थान पर एक टिटिहरी ला जोड़ा रहता था |  कुछ दिनों बाद टिटिहरी ने गर्भ धारण किया और जब उसके प्रसव का समय आया तो उसने अपने पति से कहा- “प्रिय! अब मेरा प्रसव काल निकट अ रहा है, इसलिए आप किसी सुरक्षित स्थान की खोज कीजिए,  जहाँ मैं शांतिपूर्वक अपने बच्चों को जन्म दे सकूँ |”

पत्नी की बात सुनकर टिटिहरी बोला-“प्रिय! समुन्द्र का यह भाग अत्यंत रमणीय है | मैं समझता हूँ कि तुम्हारे प्रसव के लिए यह स्थान उपयुक्त है |”

टिटिहरी बोली-“नहीं, प्रिय! यहाँ पूर्णिमा के दिन समुन्द्र में ज्वार आता है | उसमें तो बड़े-बड़े हाथी भी बह जाते हैं | अतः हमें यहाँ से दूर किसी अन्य स्थान पर जाना चाहिए |”

टिटिहरी बोली-“तुम भी कैसी बातें करती हो | समुन्द्र की क्या शक्ति कि वह मेरे अण्डों को बहा ले जाए | तुम निश्चिन्त होकर यहीं प्रसव करो | पराजय या तिरस्कार के भय से अपने स्थान को त्याग देने वाले कायर व्यक्ति को जन्म देकर यदि उसकी माता स्वयं को पुत्रवती समझती है, तो फिर बंध्या कौन-सी स्त्री कही जाएगी ?”

समुन्द्र दोनों का वार्तालाप सुन रहा था |  टिटिहरे की गर्वोक्ति सुनकर उसने सोचा-“यह तुच्छ पक्षी कितना अभिमानी हो गया है | आकाश के गिरने के भय से यह दोनों पैरों को ऊपर उठा कर सोता है, यह सोचता है कि इस तरह से यह आकाश को अपने पैरों पर रोक लेगा |

कौतूहल के लिए इसकी शक्ति को भी देख लेना चाहिए | इसके अंडे अपहरण कर लेने के बाद यह क्या करता है, यह देख ही लूं |”

बस, यही सोचकर टिटिहरी ने जब अंडे दिए, और जब टिटिहरी और टिटिहरा भोजन की खोज में निकले हुए थे, तो समुन्द्र ने लहरों के बहाने से उनके अण्डों का अपहरण कर लिया |

वापस लौटने पर जब टिटिहरी ने अण्डों को अपने स्थान पर नहीं देखा तो विलाप करती हुई अपने पति से बोली-“मैंने पहले ही तुम्हें समझाया था कि कहीं और चले, लेकिन मूर्खता के घमंड में तुमने मेरी बात नहीं सुनी | इस संसार में जो व्यक्ति हित चाहने वाले अपनों की बात पर धयान नहीं देता, वह काठ के पतित कछुए कि तरह ही विनष्ट हो जाता है |”

टिटिहरे ने पूछा-“वह कैसे ?”

तब टिटिहरी ने टिटिहरे को यह कथा सुनाई |

 

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