प्रेम और वासना

प्रेम और वासना

 
ले रेशमी जाल वासना,
उलझन लाती क्षण-क्षण जीवन में ।
दिखा नील-कुसूम की वाटिका,
भटकाती है कंटक वन में ।
वासना है नदिया बरसाती,
बहती तोड कुल किनारे को ।
प्रेम हैं अंतःनीरा सरस्वती,
अंतस में बहाती धारे को ।
प्रेम लुटाता हैं नित निज को,
तोड़ घृणा के गढ की दीवार ।
वासना मांगती मूळय अभिनय का,
अपनी दोनो हाथ पसार ।
प्रेम सेतु है जोड़ता तटों को,
लेता नही कोई प्रतिदान ।
भाया-वन की मोहकता में
भटकाकर वासना लेती जान ।
वासना बाँधती है मन को,
प्रेम खोलता बंधन डोर ।
वासना थिरकती तन के तल पर,
ले जाती यह भोग की ओर ।
आते रहे धरा पर अनेकों,
भोगवाद के प्रवकता प्रबल ।
भोग भुकत होते रहे स्वयं ही,
होकर निर्बल निस्संबल ।
जला दीप कि ..जलने वाले,
आ पहुँचे हजार-हजार ।
जल रहे अनेकों देख इसे,
जलने को फिर भी तैयार ।
तपता दीप का धातु तत्व भी,
जलता उसमें रखा तेल।
जल मिटती है बाती तब ही,
हो पाता किरणों का खेल ।
प्रेम मग्न जलते हैं तीनों,
फूटती ज्योति की अजस् धार ।
आनंदातिरेक में आता आनंदातिरेक
आकर करता तन को क्षार ।
जलकर ये गढ़ रहे जगत में,
प्रेमतत्व कि परिभाषा ।
या जलकर हटा रहे ये,
प्रेम-पंथ से सघन कुहासा ।
छोड़ अवशेष तनिक सा क्षार,
करते शलभ प्राणों का त्याग
यह क्षार नहीं है सार तत्व ,
है प्रेम-पुष्प का दिव्य पराग ।
प्रेम, दीप-शिखा है उसे देवी की,
जो ज्योति लुटाती रहती है।
प्रिय आगमन की आस लिये,
पथ आलोकित करती है।
  -सुबल चन्द्र राय’सुधाकर’

Comments

comments

Rating: 4.0/5. From 4 votes. Show votes.
Please wait...
Spread the love
  • 19
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    19
    Shares

About the Author:

Leave A Comment