नेह

* * * नेह * * *

अँखियाँ मेरी बावरी
ऐसा उपजाया नेह
न तो मन अपना रहा
न ही अपनी देह

मन मतवाला यूँ हुआ
लुटाया अपना चैन
देह दुविधा में धरी
छम – छम बरसे नैन

कथा अनोखी देह की
बरखा में सूखी जाए
नयना संग बँधी – बँधी
जाए जहाँ मन ले जाए

मैं मेरा मरघट गया
मिली जो पीपल छाँव
मैं तू दोनों इक हुए
इक दोनों का नाँव

मन अँखियाँ तन भीजते
भीजी सारी बात
मेह बरसा तेरे नेह का
बरसा सारी रात

बरसा सारी रात . . . . . !

वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

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