तुम्हारे गुस्से भरे
बनते-बिगड़ते चेहरे की ओर
देख पाने का साहस नहीं कर पाती हूँ
भोर के शांत,निखरी सूरज सी तुम्हारी आँखों में
बैशाख की दुपहरी का ताव
देख पाना मेरे बस का नहीं न
हमेशा की तरह चुपचाप
सिर झुकाये,
गीली पलकों का बोझ लिये
मैं सहमकर तुम्हारे सामने से हट जाती हूँ
और तुम, ज़ोर से
दरवाज़ा पटक कर चले जाते हो
कमरे में फैली शब्दों की नुकीली किर्चियों को
बिखरा छोड़कर
‎बैठ जाती हूँ खोलकर कमरे की खिड़की
हवा के साथ बहा देना चाहती हूँ
कमरे की बोझिलता
नाखून से अपने हरे कुरते में किनारों में कढ़े
लाल गुलाब से निकले धागों को तोड़ती
तुम्हारी आवाज़ के
आरोह-अवरोह को महसूस करती हूँ
सोचती हूँ
कैसे बताऊँ बहुत दर्द होता है
शब्दों के विष बुझे बाणों के तीक्ष्ण प्रहार से
अंतर्मन लहुलुहान हो जाता है
क्यों इतनी कोशिशों के बाद भी
पर हर बार जाने क्यों,कैसे तुम नाराज़ होते हो
तुम्हारी असंतुष्टि से छटपटाती
तुम्हारी बातों की चुभन झटकने की कोशिश में
देखने लगती हूँ
नीेले आकाश पर टहलते उदास बादल
पेड़ों की फुनगी से उतरकर
खिड़की पर आयी गौरेया
जो मेरे चेहरे को गौर से देखती
अपनी गुलाबी चोंच से
परदे को हटाती,झाँकती, फिर लौट जाती है
चुपचाप
दूर पहाड़ पर उतरे बादल
ढक लेना चाहते है मेरी आँखों का गीलापन
मन के हर कोने में
मरियल-सी ठंडी धूप पसर जाती है
बहुत बेचैनी होती है
तुम्हारे अनमने चेहरे पर
गुस्से की लकीरों को पढ़कर
ख़ुद को अपनी बाहों में बांधे
सबके बीच होकर भी मानो
बीहड़ वन में अकेली भटकने लगती हूँ
फिर,
हर बार की तरह एक-आध घंटों के बाद
जब तुम फोन पर कहते हो
सुनो, आज खाना मत बनाना
हम बाहर चलेगे आज
मेरी भरी,गीली आवाज़ को तुम
जानबूझकर अनसुना कर देते हो
कुछ भी ऐसा कहते हो
कि मैं मुसकुरा दूँ,
मजबूरन तुम्हारी बातों का जवाब दूँ,
उस एक पल में ही सारी उदासी उड़ जाती है
तुम्हारी बातों के ताज़े झोंके के साथ
सुनो, तुम भले न कहो
पर , मैं महसूस कर सकती हूँ
तुम्हारे जताये बिना
तुम्हारे हृदय में
अपने लिए गहरे, चिरयौवन प्रेम को।

#श्वेता🍁

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