चिट्ठी

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चिट्ठी

By |2018-04-10T19:58:20+00:00April 9th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

कुछ बरस ही बीते होंगे

चिट्ठी का औचित्य ख़तम हुए

पर वह संवेदना और भावना

आज कहाँ है इन यस-यम-यस

और ई-मेल में

कहाँ है इसमें मन का प्यार

चहुँ ओर है केवल व्यभिचार

कहाँ है इसमें मन की बातें

यहाँ तो है केवल लोकाचार

यादों को कुरेद कर

छोटे से टुकड़े पर

जब मन की अस्थिरता

स्याही के माध्यम से

ढलकती है उन कागज पर

तब ना जाने कितने मीलों को पार कर

यह पहुचती है अपने प्रियतम के पास

तब सब्र की इंतिहा भी

टूट जाया करती है

और उसे छूने और पढने

की ललक लिए आपोआप

कर बढ़ते चले जाते है

अपने यादों को सहेजकर

और अतीत से नाता जोड़कर

उस भीनी भीनी सुगंध

को महसूस कर

रोम-रोम में प्रेम रस

और नैन पटल में शबनम

प्रस्फुटित होता है

काश फिर वही चलन चल जाये

चिट्ठियां आये और जाये

शायद ऐसा मुमकिन न हो

यह सोचकर मन कुंठित होता है

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About the Author:

हिंदी से स्नातक, नेटिव प्लेस जौनपुर उत्तरप्रदेश कविता, कहानी लिखने का शौक

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