आपका त्यौहार है
2122 2122 212

बेदवा ये इश्क़ का आजार है
आज दीवाना बहुत लाचार है
( आजार = रोग/मरज़ )

दो दिलों में एक सा ही दर्द है
दिल से दिल का मिल गया जो तार है

सावधानी से गुलों को छू ज़रा
फूल की करता हिफ़ाजत ख़ार है

हम ग़रीबों के लिये होता कभी
रोज़ लेकिन आपका त्यौहार है

हैं न सुन्दर और ख़ुश्बू भी नहीं
कागजी फूलों का ये अंबार है

चीर देती ज़ह् न, दिल भी जिस्म भी
वो ज़ुबाँ अब हो गयी तलवार है

नींव बिन कैसे खड़ा होगा महल
नींव बिन टिकती नहीं दीवार है

उलझनें हैं ज़िन्दगी में इस क़दर
रोज़ ख़ुशियों से रही तकरार है

दोस्ती ‘आनन्द’ होती भी यही
वक़्ते-मुश्क़िल काम आता यार है

स्वरचित
– डॉ आनन्द किशोर
दिल्ली,

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