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तलब

By |2018-04-14T12:37:54+00:00April 14th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments
तलब एक चीज है ऐसी,
नशा उसमे भरा होता है;
कहाँ हूँ और कौन हूँ मै,
इसका कहाँ पता होता है|
अजीब सी इसमे कशिश होती है,
नशा की कई प्रजाति होती है,
सब अपने अपने नशे में मस्त है;
जिसे देखो सब के सब लस्त पस्त है|
किसी को नफ़रत का नशा,
किसी को  प्यार का,
किसी को जीत का नशा,
किसी को हार का,
कोई बड़ा हो या छोटा हो,
पतला हो या मोटा हो,
सब पे नशा इस कदर छाया है;
कही धुप है तो कही छाया है|
बड़े बूढ़े कह गए की एक नशा जरूरी है,
आज यही नशा हमारी मजबूरी है|
नशे में हम आज कितने चूर है,
हम अपनों से आज कितने दूर है|
नशा छोडो यारों और जीवन सफल बनाओ;
इस “राज” को  यारों अब तो समझ जाओ|
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About the Author:

हिंदी से स्नातक, नेटिव प्लेस जौनपुर उत्तरप्रदेश कविता, कहानी लिखने का शौक

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